‘आधार’ योजना को मजबूती
Shreya Kedia

आधार की भूमिका को समाज कल्याण की विभिन्न योजनाओं से चोरी और सेंधमारी रोकने के लिए बनाए गए स्वैच्छिक दस्तावेज मात्र से बढ़ाकर गैर कल्याणकारी योजनाओं के लिए पहचान प्रमाणित करने वाला एकमात्र दस्तावेज बनाने की केंद्र सरकार की योजना से पता चलता है कि सरकार को यह अहसास हो गया है कि इस मंच को अधिक वैधता और स्वीकार्यता प्रदान करने से ऐसी प्रणाली तैयार करने की असीम संभावना है, जिसका सत्यापन आसानी से हो सकेगा और अनियमितताएं कम हो जाएंगी।

इस सिलसिले में सरकार की हाल की दो घोषणाओं पर ध्यान देना चाहिए। पहली, वित्त विधेयक, 2017 में संशोधन के जरिये स्थायी खाता संख्या (पैन) के आवेदन तथा आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए आधार को अनिवार्य करना। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने लोकसभा में कहा, “कई देश हैं, जहां ऐसा होता है। अमेरिका में सामाजिक सुरक्षा क्रमांक होता है और भारत में उसी तरह यह (आधार) हो सकता है।” उन्होंने आगे कहा कि आधार की बायोमीट्रिक विशेषताएं “धोखाधड़ी” पर लगाम कस देंगी। संशोधन के अनुसार, “आधार के लिए अर्हता रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति 1 जुलाई, 2017 को और उसके बाद (1) स्थायी खाता संख्या के आवंटन के आवेदन पत्र में; (2) आयकर रिटर्न में आधार क्रमांक का उल्लेख करेगा।” इसका अर्थ यह होगा कि इस वर्ष जुलाई से ही करदाता तब तक अपना आयकर रिटर्न दाखिल नहीं कर पाएंगे, जब तक वे आधार क्रमांक नहीं देते अथवा आधार के लिए आवेदन करने का प्रमाण नहीं दिखाते। साथ ही, जिनके पास आधार नहीं है, उन्हें फौरन आधार के लिए पंजीकरण कराना होगा। जब तक उन्हें आधार क्रमांक नहीं मिलता तब तक आयकर रिटर्न दाखिल करने के लिए वे अपने पंजीकरण क्रमांक का इस्तेमाल कर सकते हैं। जो लोग नए पैन कार्ड के लिए आवेदन कर रहे हैं, उन्हें आवेदन पर अपना आधार क्रमांक लिखना होगा। इनमें से कोई भी दस्तावेज नहीं देने पर पैन तथा आयकर रिटर्न को निरस्त मान लिया जाएगा।

वित्त मंत्री ने पैन कार्ड की खामियां दूर करने के बजाय आधार में भरोसा जताया है, इससे दो बातें पता चलती हैं: पहली, फर्जीवाड़े के लिए पैन कार्ड का इस्तेमाल करने वालों को पकड़ने में तंत्र की नाकामी; दूसरी, पैन कार्ड की तुलना में आधार में अधिक मजबूत सुरक्षा फीचर हैं। और सरकार सभी करदाताओं को आधार के दायरे में लाना क्यों नहीं चाहेगी, जब यह पता है कि पैन के मुकाबले आधार का दायरा बहुत बड़ा है। पैन कार्ड केवल 25 करोड़ लोगों के पास हैं, जिनमें से केवल 4 करोड़ करदाता कर चुकाते हैं। लेकिन 31 मार्च, 2017 को पूरे भारत में लगभग 113 करोड़ लोगों के पास आधार था। वित्त विधेयक के प्रावधान सही दिशा में हैं, लेकिन शायद बड़ी संख्या में करदाताओं को वे अच्छे नहीं लगेंगे। पैन और आधार को जोड़ने से करदाताओं के बजाय कर अधिकारियों को अधिक लाभ होगा। कर अधिकारियों के लिए लाभ यह है कि नजर रखने वाला यानी ट्रैकिंग करने वाला एक मॉडल तैयार हो जाएगा, जिससे करदाताओं की जवाबदेही बढ़ जाएगी। इसका अंतिम उद्देश्य कर चोरी तथा धोखाधड़ी जैसी गैर-कानूनी गतिविधियों पर रोक लगाकर कर चुकाने की प्रणाली को पारदर्शी बनाना है। पैन कार्ड का उपयोग लंबे समय से गलत कारणों से - कर चोरी के लिए - हो रहा है। अतीत में ऐसे कई मामले देखे जा सकते हैं, जहां अपनी आय घटाकर दिखाने के लिए एक ही व्यक्ति के पास एक नहीं बल्कि पांच पैन कार्ड थे। ऐसे कई लोग हैं, जो अपने पैन कार्ड की जानकारी तो देते हैं, लेकिन वह फर्जी होती है। अन्य लोग ऐसे लोगों की पहचान बताते हैं, जो होते ही नहीं हैं। ऐसे लेनदेन कर अधिकारी की नजर से बचे रहते हैं। सरकार को उम्मीद है कि विमुद्रीकरण के निर्णय के साथ ही पैन तथा आधार को जोड़ने के इस प्रस्ताव से कई उद्देश्य पूरे हो जाएंगे। पहला, यह सुनिश्चित होगा कि किसी भी व्यक्ति के पास एक से अधिक पैन कार्ड नहीं हों। दूसरा, अब सभी लेनदेन का पता लगाया जा सकेगा। पैन और आधार को जोड़ने से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि कोई भी फर्जी लेनदेन नहीं हो। एक बार ऐसा हो जाएगा तो आयकर विभाग के पास करदाता के वित्तीय लेनदेन तथा उसकी संपत्तियों के बारे में पूरी जानकारी होगी।

किसी भी व्यक्ति के आयकर रिटर्न में बताए गए लेनदेन का मिलान उसके आधार से मिली जानकारी के साथ किया जा सकता है और यदि दोनों एक जैसे न हों तो कर अधिकारी आगे जांच कर सकते हैं। करदाता की जवाबदेही बढ़ाने के साथ ही यह कदम काले धन और बेनामी सौदों के खिलाफ सरकार के अभियान के लिए भी वरदान बन जाएगा क्योंकि सरकार उन सौदों को वास्तविक व्यक्ति से जोड़ पाएगी। किंतु कर अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होगा कि करदाताओं को प्रताड़ित नहीं किया जाए। दूसरी बात दूरसंचार विभाग द्वारा सभी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को दिए गए उस निर्देश से संबंधित है, जिसमें उनसे एक वर्ष के भीतर अपने सभी ग्राहकों का आधार पर आधारित इलेक्ट्रॉनिक नो योर कस्टमर (केवाईसी) प्रणाली के जरिये दोबारा सत्यापन करने को कहा गया है। किसी भी व्यक्ति को सिम कार्ड खरीदने के लिए जिस कष्टप्रद लेकिन लगभग असंभव प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, उसे देखते हुए यह निश्चित रूप से स्वागत योग्य कदम है। उन लोगों को और भी समस्या होती है, जो अपना गृह राज्य छोड़कर कहीं और जाते हैं। पहचान का कोई भी साक्ष्य - चाहे ड्राइविंग लाइसेंस हो, मतदाता पहचान पत्र हो अथवा किरायानामा (रेंट एग्रीमेंट) हो - तब तक प्रमाण नहीं माना जाएगा, जब तक यह सिद्ध न हो जाए कि वह व्यक्ति उसी स्थान पर रहता है। आधार नेटवर्क का इस्तेमाल कर करोड़ों ग्राहकों को अपने नेटवर्क से जोड़ने वाली रिलायंस जियो की सफलता को देखते हुए यह माना जा सकता है कि सिम कार्ड खरीदना आसान हो जाएगा। किंतु सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि यह प्रक्रिया पूरे भारत में चलाई जाए।

संभवतः इस विशिष्ट पहचान क्रमांक की अपरिमित संभावनाओं को विभिन्न केंद्रीय मंत्रालय भी पहचान चुके हैं क्योंकि उन्होंने अपनी अनेक योजनाओं के लिए आधार को अनिवार्य बनाने की अधिसूचनाएं जारी कर दी हैं। ढेरों कल्याणकारी तथा गैर कल्याणकारी योजनाओं के लिए अब आधार अनिवार्य हो चुका है, जिनमें भोपाल गैस रिसाव कांड के पीड़ितों को मुआवजे की राशि, सर्व शिक्षा अभियान, बंधुआ मजदूर पुनर्वास योजना, राष्ट्रीय दिव्यांग कौशल प्रशिक्षण कार्य योजना तथा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत भुगतान शामिल है। इतनी विविध योजनाओं से स्पष्ट हो गया है कि सरकार राज्य एवं उसके नागरिकों के बीच तालमेल बिठाने के लिए आधार को आवश्यक जरिया बनाना चाहती है। सरकार के पहचान कार्यक्रम ने पूरे राष्ट्र को चौंका दिया है, जिनमें विपक्ष और आधार-विरोधी प्रणाली के समर्थक भी शामिल हैं, जिनकी दलील है कि विशिष्ट पहचान क्रमांक नागरिकों पर थोपा जा रहा है। ऐसे लोग निजता की चिंता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कुछ लोगों को कल्याणकारी योजनाओं से बाहर किए जाने के मुद्दे पर अदालत भी पहुंच चुके हैं। ये बाधाएं कार्यक्रम के सामर्थ्य को कम करके बताने के प्रयास भर हैं।

सबसे अहम बात यह है कि योजना की संवैधानिक वैधता के लिहाज से पात्रता का प्रश्न कई बार सर्वोच्च न्यायालय में उठाया गया है। आलोचकों की दलील है कि स्कूल और कॉलेज में प्रवेश हो या ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करना हो या विभिन्न सरकारी लाभ लेने हों, आम नागरिक जो भी करना चाहता है, उसमें लगभग सभी के लिए आधार को अनिवार्य करने का सरकार का फैसला आवेग में लिया गया है। उच्चतम न्यायायल का सबसे नया फैसला मार्च में आया, जिसमें शीर्ष अदालत ने अपने पुराने आदेश को दोहराते हुए कहा कि “आधार कार्ड योजना पूरी तरह स्वैच्छिक है और इसे तब तक अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता, जब तक यह अदालत इस मामले में अंतिम फैसला नहीं कर देती।” इससे पहले 23 सितंबर, 2013 को अदालत ने स्पष्ट कर दिया था कि “कुछ विभागों ने आधार को अनिवार्य करने की सूचना जारी कर दी है फिर भी आधार कार्ड नहीं होने के कारण किसी भी व्यक्ति को कष्ट नहीं होना चाहिए।” उसने कहा था कि “जब कोई व्यक्ति आधार कार्ड बनवाने के लिए स्वेच्छा से आवेदन करता है तो यह जांचा जा सकता है कि वह व्यक्ति कानून के तहत आधार के लिए पात्र है अथवा नहीं और किसी भी अवैध आव्रजक को यह नहीं मिलना चाहिए।” कहने का अर्थ यह नहीं है कि शीर्ष अदालत आधार को अनिवार्य बनाने के पूरी तरह खिलाफ है। उसने सरकार को रसोई गैस की आपूर्ति के लिए, विभिन्न जन वितरण प्रणालियों के लिए, मनरेगा के लिए, जन धन योजना के लिए, पैन कार्ड के लिए, कर रिटर्न दाखिल करने के लिए और बैंक खाते खुलवाने के लिए इस कार्ड का प्रयोग करने की अनुमति दे दी है। लेकिन उसने यह शर्त रखी है कि जब तक इस मामले में आखिरी निर्णय नहीं हो जाता है तब तक आधार स्वैच्छिक ही रहेगा और अनिवार्य नहीं बनाया जा सकेगा। फिर भी विभिन्न आलोचक और विश्लेषक दलील देते रहे हैं कि सरकार ने अदालत के अंतरिम आदेशों का जानबूझकर उल्लंघन किया है और आधार को अनिवार्य बना दिया है। उनका यह भ कहना है कि आधार के मसले पर कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के बीच मतभेद है।

यह सच है कि सरकार आधार को कल्याणकारी योजनाओं के लिए अनिवार्य बनाना चाह रही है किंतु अदालत की ही तरह उसका भी यही कहना है कि आधार स्वैच्छिक होना चाहिए। इसके लिए कानून के तहत एक प्रावधान है, जो सुनिश्चित करता है कि आधार कार्ड नहीं होने पर भी किसी जरूरतमंद व्यक्ति को सामाजिक कल्याण के लाभों से वंचित नहीं किया जाए। आधार (वित्तीय एवं अन्य सब्सिडी, लाभ तथा सेवाओं की लक्षित आपूर्ति) अधिनियम, 2016 की धारा 7 में स्पष्ट है कि जब तक लक्षित व्यक्ति को आधार क्रमांक आवंटित नहीं किया जाता है तब तक वह लाभ प्राप्त करता रह सकता है। आश्चर्य की बात है कि इस कार्यक्रम की “जननी” कांग्रेस पार्टी इस कार्यक्रम को कानूनी जामा पहनाने के भाजपा के प्रयासों के विरुद्ध खड़ी है। जनांकिकी एवं बायोमीट्रिक जानकारी वाला 12 अंक का विशिष्ट पहचान क्रमांक 2009 में संप्रग सरकार द्वारा शुरू किया गया था। आरंभ में योजना आयोग के अधीन भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) को 1 अरब भारतीयों के पहचान पत्र बनाने का भारी भरकम काम सौंपा गया। बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने साहसिक कदम उठाते हुए इन्फोसिस के सह-संस्थापक तथा अब आधार के मुख्य शिल्पी नंदन नीलेकणी को परियोजना की कमान सौंप दी। नीलेकणी ने योजना को वाकई अच्छे ढंग से चलाया। इसे देश भर में फैलाने के लिए उनके नेतृत्व में कई कदम उठाए गए। आधार क्रमांकों की ऑनलाइन सत्यापन प्रणाली आरंभ करना उनमें से अहम कदम था। इसी तरह आधार से जुड़ी हुई प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) योजना आरंभ की गई। यह योजना इतनी सफल रही कि नवंबर 2011 में जहां महज 10 करोड़ पंजीकरण थे, वहीं फरवरी 2012 में आंकड़ा बढ़कर 20 करोड़ हो गया।

किंतु नीलेकणी राजनीतिक नेतृत्व को इस बात के लिए नहीं मना पाए कि आधार को सांविधिक दर्जा दिया जाए। संप्रग सरकार की धीमी चाल तब और मंद पड़ गई, जब परिचालन में दिक्कतों के कारण यह कार्यक्रम विवादों में घिर गया। इसके ढेरों दुश्मन थे। सबसे बड़ी आलोचना विपक्ष से आई, जिसका नेतृत्व उस समय भाजपा कर रही थी। उसका तर्क था कि अवैध घुसपैठियों को आधार नहीं मिले, यह सुनिश्चित करने के लिए यह केवल भारतीय नागरिकों को दिया जाना चाहिए, सभी नागरिकों को नहीं। दूसरी ओर वामपंथी धड़ा यह कहकर बरसने लगा कि आधार योजना जनता को सब्सिडी से वंचित रखने का संप्रग सरकार का बहाना है। नागरिक समाज के सदस्यों और कार्यकर्ताओं को यह डर था कि आधार क्रमांक का इस्तेमाल कर लोगों के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती है, जिसका गलत हाथों में पड़ने पर दुरुपयोग हो सकता है। वास्तव में इस परियोजना के दायरे को लेकर कांग्रेस के भीतर भी मतभेद थे। कई लोग इसे मौजूदा सत्ता समीकरणों के लिए खतरा मानते थे। पंजीकरण की प्रक्रिया पर नीलेकणी और तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बीच तनाव बढ़ने लगा। अंत में जब यूआईडीएआई ने पूरी आबादी का पंजीकरण करने की अनुमति मांगी तो दोनों अड़ गए। इस बीच आधार को विधायी आधार प्रदान करने के संप्रग सरकार के आधे-अधूरे प्रयासों को उस समय झटका लगा, जब यशवंत सिन्हा के नेतृत्व वाली संसदीय समिति ने भारतीय राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक को ठुकरा दिया। यूआईडीएआई और आधार को इसी प्रस्तावित कानून के अंतर्गत काम करना था।

एक और अड़चन आ गई, जब कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति केएस पुट्टास्वामी और अधिवक्ता परवेश खन्ना ने नवंबर, 2012 में सरकार के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका डाल दी। दोनों का कहना था कि सरकार बिना विधायी आधार के इस परियोजना को लागू कर रही है। इसके बाद संप्रग ने परियोजना को विधायी आधार प्रदान करने के भरपूर प्रयास किए किंतु नाकामी ही हाथ लगी। विधेयक स्थायी समिति के आगे ही नहीं जा पाया। इसके बावजूद पार्टी ने लोकसभा चुनावों में आधार को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश की और उसे खमियाजा भुगतना पड़ा। संप्रग एक सुविचारित उपाय को लागू करने में असफल रहा और सभी के लिए आधार का सपना अनिश्चितता के भंवर में गोते खाने लगा।

बहरहाल मोदी सरकार ने सभी को इस महत्वाकांक्षी परियोजना के दायरे में लाने की समयसीमा निर्धारित कर इसे आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। नीलेकणी ने प्रधानमंत्री मोदी तथा वित्त मंत्री अरुण जेटली के साथ कई बार बैठक कीं और उन्हें इस योजना के फायदों पर यकीन करा दिया। उसके बाद भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने नीलेकणी की सलाह पर राजनीति को एक तरफ रखते हुए इसे पटरी पर लाने का निश्चय किया। उसने 2014 के अंत तक 90 करोड़ लोगों को पंजीकृत करने की योजना को गति ही नहीं दी बल्कि उसे कानूनी आधार भी प्रदान किया और सभी प्रकार की सब्सिडी के लिए आधार को अनिवार्य बनाने का रास्ता साफ कराने के लिए उच्चतम न्यायालय भी पहुंच गई। संप्रग ऐसा नहीं कर सका था। इस कार्यक्रम का सबसे क्रांतिकारी क्षण तब आया, जब मार्च, 2016 में आधार विधेयक पारित हो गया। इसकी बहुत आलोचना हुई क्योंकि इसे धन विधेयक के रूप में पेश किया गया था, जिसका मतलब था कि उसे राज्य सभा की मंजूरी की आवश्यकता नहीं थी। दिलचस्प है कि राज्य सभा में इसे पारित कराने के लिए सरकार के पास पर्याप्त संख्याबल था भी नहीं। सरकार की मंशा साफ थी। वह इस महत्वपूर्ण विधेयक को ऊपरी सदन में अटकते नहीं देखना चाहती थी, जहां विपक्ष विभिन्न मसलों पर अड़ियल रुख दिखा चुका था। यह तय था कि विधेयक अटक जाएगा। जैसा सोचा गया था, विपक्ष ने केंद्र के निर्णय पर हायतौबा मचाई। उसने कहा कि सरकार ने आधार विधेयक पर उच्च सदन की अनदेखी कर उसका तिरस्कार किया है। हालांकि यह सच है कि किसी भी विधेयक को त्रुटिरहित बनाने के लिए उसकी जांच भी जरूरी है और तगड़ी बहस भी, लेकिन विपक्षी दलों को भी यह देखना चाहिए कि वे उच्च सदन में अपने संख्या बल का सही इस्तेमाल करते आए हैं अथवा नहीं। या विपक्षी दल उन लाभदायक नीतियों और कार्यक्रमों में व्यवधान डालने के लिए ही काम कर रहे हैं, जिन्हें जल्द से जल्द लागू होना चाहिए।

आज परिणाम सबके सामने है। आधर विश्व का सबसे बड़ा बायोमीट्रिक पहचान कार्यक्रम बन चुका है। देश में लगभग 99 प्रतिशत वयस्कों (असम और मेघालय को छोड़कर, जहां आधार कार्यक्रम अभी तक चालू नहीं हुआ है) के पास आधार क्रमांक हैं। लेकिन 5 से 18 वर्ष की श्रेणी में असली कमी है। इस आयु वर्ग में लगभग 21 करोड़ लोगों को अभी तक यूआईडी कार्ड नहीं मिला है। यही कारण है कि सरकार ने अपनी रणनीति बदलकर विश्वविद्यालय की डिग्रियां पाने, मध्याह्न भोजन पाने, स्कूल में प्रवेश पाने के लिए आधार को अनिवार्य बना दिया है। निजता के मुद्दों पर चिंताओं को दूर करना निश्चित रूप से सरकार की जिम्मेदारी है। यह खतरा वास्तविक है क्योंकि इस बार की पूरी संभावना है कि आधार प्राधिकरण द्वारा इकट्ठी की गई लोगों की निजी बायोमीट्रिक जानकारी तक निजी संगठन आसानी से पहुंच सकते हैं और अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसका दुरुपयोग भी कर सकते हैं। पहचान की चोरी का डर वास्तविक है। पेशेवर अपराधियों और हैकरों की पूरी फौज अपराध करने के लिए डेटाबेस में से निजी जानकारी जुटाने के लिए दिन-रात काम कर रही है।

अधिकतर विरोध आधार कार्ड के लिए इकट्ठी की जा रही संवेदनशील निजी जानकारी के कारण है। अधिनियम में धाराएं हैं, जहां निजता तथा सूचना की गोपनीयता के मसले का ध्यान रखा गया है। उदाहरण के लिए अधिनियम की धारा 29(1) कहती है कि “किसी भी कारण से कोई भी बायोमीट्रिक जानकारी न तो साझा की जा सकती है और न ही आधार क्रमांक बनाने तथा सत्यापन करने के अलावा किसी अन्य उद्देश्य हेतु इस्तेमाल की जा सकती है।” किंतु उसी अधिनियम की धारा 33 इस प्रावधान को धता बताती है। वह कहती है कि यदि संयुक्त सचिव की श्रेणी का अधिकारी अनुमति दे तो “राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में” बायोमीट्रिक जानकारी का प्रयोग किया जा सकता है। प्रावधानों का ऐसा टकराव उन आलोचकों के डर को और बढ़ाएगा, जो इस कार्यक्रम के पीछे की तुक पर सवाल खड़े कर रहे हैं। स्पष्ट है कि जानकारी की सुरक्षा के लिए ये प्रावधान पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि उनमें एक शर्त के ऊपर दूसरी शर्त है। सरकार ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि निजता के मुद्दों को सुलझाने के लिए एक नीति का मसौदा तैयार हो रहा है किंतु हमारे पास अब भी उसके लिए कोई स्पष्ट समयसीमा नहीं है। निजता के मुद्दों का समाधान करने के लिए सीमारेखा खींचनी पड़ेगी। इससे सरकार अनावश्यक प्रतिक्रियाओं से बच जाएगी। सरकार हाल में पारित किए गए वित्त विधेयक में जिन संशोधनों को शामिल करने से चूक गई है, उन्हें जल्द से जल्द किया जाना चाहिए। आधार के साथ ऐसी समस्याएं नहीं हैं, जिन्हें खत्म नहीं किया जा सकता। न ही उनसे यह साबित होता है कि आधार को सत्यापन की एकमात्र पहचान बताने के पीछे सरकार की मंशा गलत है। इस हिसाब से यह आलोचना कहीं नहीं टिकती कि सरकार इस कार्यक्रम का इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए कर रही है।

भारत के पास अनूठा मौका है। वह अमेरिका के अनुभवों से सीख सकता है, जहां सामाजिक सुरक्षा क्रमांक बहुत सफल रहा है और ब्रिटेन से भी सीख सकता है, जहां पहचान पत्र परियोजना एकदम नाकाम रही।

(लेखिका पत्रकार हैं और समाज कल्याण के मुद्दों में उनकी रुचि है)


Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Image Source: http://timesofindia.indiatimes.com

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