प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत यात्रा
Amb Pankaj Saran

सितंबर 2022 में बांग्लादेश प्रधानमंत्री शेख हसीना की भारत की राजकीय यात्रा इस क्षेत्र से भारत के सबसे महत्वपूर्ण संबंधों में से एक को प्रतिबिंबित करती है।

2008 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से यह शेख हसीना की भारत की चौथी आधिकारिक द्विपक्षीय यात्रा है। उनकी इस यात्रा ने उन्हें और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दोनों देशों के संबंधों की स्थिति की समीक्षा करने और भविष्य में इसे और मजबूत करने का भी अवसर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बांग्लादेश के साथ संबंध मजबूत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सरकार की प्रतिबद्धता के विषय में बांग्लादेशी जनता में संदेह के विपरीत, 2014 के बाद से संबंधों ने नई ऊंचाइयों को छुआ है।

निश्चित रूप से व्यक्तित्व मायने रखता है, हमारे पड़ोस में और बांग्लादेश में भी। शेख हसीना का जीवन और समय इतिहास से भरा हुआ है, जैसा कि कुछ सार्वजनिक हस्तियों का होता है। उनकी निजी जिंदगी और उनका जुड़ाव बांग्लादेश की कहानी से ही जुड़ा हुआ है। अपने पिता की ही तरह शेख हसीना भी उस पार्टी का पर्याय हैं जिसका वह नेतृत्व करती हैं। देश को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के तुरंत बाद बांग्लादेश से राजनीतिक और शारीरिक रूप से निर्वासित होने के बाद, शेख हसीना के नेतृत्व में अवामी लीग 1996 में सत्ता में लौटी। यह 1975 में शेख मुजीब की हत्या के इक्कीस साल बाद की बात है। तबतक बांग्लादेश काफी बदल गया था। इस दौरान 1975 के बाद पहली अवामी लीग सरकार के खिलाफ भारी संभावनाएं थीं।

अपने प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान पिछले तेरह वर्षों में शेख हसीना ने ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने और देश को उसके लोगों को सही रूप में लौटाने का काम किया है। बांग्लादेश के संबंध में उनकी निर्भीकता और विश्वास अद्भुत है। यह कल्पना करना भी असंभव लगता था कि बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान की बेटी को बांग्लादेश के जन्म के स्वर्ण जयंती समारोह की अध्यक्षता करने के लिए चुना जाएगा। भारत के प्रति शेख हसीना की नीति को "1971 की भावना" के रूप में देखा जा सकता है। देश के भीतर और बाहर के उनके कार्यों और साहस ने भारतीय नीति निर्माताओं को आश्चर्यचकित कर दिया। वह अपने सशस्त्र बलों और उन खाड़ी देशों के साथ विश्वास की खाई को पाटने में सक्षम रही हैं, जो कुछ साल पहले तक उन्हें और उनकी पार्टी को इस्लाम विरोधी मानते थे।

भारत-बांग्लादेश संबंध 2008 से बेहतर हुए हैं। यह संबंध राजनीतिक स्तर पर आने वाली सुरक्षा और आर्थिक बिंदु पर टिकी है। हसीना के नेतृत्व वाले बांग्लादेश ने उस बुनियादी ढांचे को खत्म करने के लिए ठोस कदम उठाए हैं जो भारत को उत्तर पूर्व क्षेत्र से प्रभावित करने के लिए बनाया गया था। इस नेतृत्व ने बांग्लादेश के भीतर आतंकवाद-कट्टरपंथी-चरमपंथी-संशोधनवादी माफिया का मुकाबला किया है, जिसे पहले की बांग्लादेशी सरकारों की मिलीभगत से पाकिस्तानी संस्थानों द्वारा पोषित किया गया था।

दूसरी ओर, भारत ने आर्थिक, व्यापार, विकास और संपर्क के मोर्चों पर बांग्लादेश की मांगों के समर्थन के लिए अपनी शक्ति का विस्तार किया है। बांग्लादेश भारत की सॉफ्ट क्रेडिट लाइन, दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश के रूप में खुली और गैर-पारस्परिक पहुंच, दुनिया में कहीं भी भारत द्वारा सबसे बड़े वीजा संचालन, ऊर्जा और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। मजबूत आपूर्ति और मूल्य श्रृंखला तैयार की गई है, उदाहरण के लिए रेडीमेड वस्त्र क्षेत्र में। भूमि विवाद सुलझा और सीमा तय की गई, जिसके लिए भारतीय संविधान में संशोधन किया गया और आबादी की बसावट की गई। भारत ने समुद्री सीमा पर अपनी पारंपरिक स्थिति के खिलाफ जाकर संयुक्त राष्ट्र के फैसले को द्विपक्षीय रूप से निपटाने की पहल को स्वीकार किया। कूटनीतिक रूप से भारत ने वैश्विक मंचों पर बांग्लादेश को पूरा समर्थन दिया है।

सहयोग का एक क्षेत्र जो अपनी उल्लेखनीय प्रगति के लिए विशिष्ट है, वह है संपर्क (कनेक्टिविटी)। इस क्षेत्र में पिछले चालीस वर्षों की तुलना में पिछले तेरह वर्षों में अधिक कार्य हुआ है। कई पहलों का उद्देश्य पश्चिमी पाकिस्तान में सैन्य शासकों द्वारा पूर्वी पाकिस्तान और भारत के बीच बनाई गई स्थिति को बदलना है। जबकि पश्चिम में पाकिस्तान के पास जो बचा है वह अभी भी भारत के साथ विवाद, बहस और ऐतिहासिक दुश्मनी में फंसा हुआ है, पूर्व में भारत के साथ संपर्क की वृद्धि इसके पैमाने, गति और नवीनता पर केन्द्रित है। 1971 से पहले के संबंधों को बहाल करके बांग्लादेश अपने पूर्व शासकों की बेड़ियों से मुक्त हो गया है।

संधियों में ग्रीनफील्ड परियोजनाएं और उन्नयन दोनों प्रकट होती हैं। सूची लंबी है लेकिन इसमें सड़क, रेलवे, अंतर्देशीय जलमार्ग, हवाई संपर्क, तटीय नौवहन, बिजली लाइनें, ऊर्जा पाइपलाइन, सीमा अवसंरचना, सीमा व्यापार, वैल्यू चेन, सांस्कृतिक और लोगों से लोगों के बीच आदान-प्रदान और प्रत्येक को पारस्परिक रूप से दिए गए अधिकार शामिल हैं।

दोनों पक्षों के सामने अनसुलझे मुद्दे और चुनौतियां भी हैं। ये भौगोलिक विशेषताओं, विभाजन की विरासत, घरेलू राजनीति और तीसरे देशों की भूमिका से उत्पन्न होते हैं। बांग्लादेश की तुलना में भारत बड़ा है, और बांग्लादेश पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्व के लिहाज से बड़ा है। ऐसी समस्याएं हैं जिन्होंने दोनों पक्षों की संतुष्टि के लिए समाधान की उपेक्षा करती है। इसलिए अधूरे और कामचलाऊ उपायों का सहारा लिया गया है। सामान्य नदी जल प्रबंधन और बंटवारा, सीमा प्रबंधन, अवैध प्रवास, अल्पसंख्यकों का कल्याण, समाज के कुछ तत्वों और वर्गों की भूमिका इनमें शामिल हैं। ये ऐसे मुद्दे हैं जो या तो निष्क्रिय हो सकते हैं या भड़क सकते हैं, इसलिए इन पर कड़ी नजर रखने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री हसीना की यात्रा और उससे कुछ दिन पहले संयुक्त नदी आयोग की बैठक के दौरान घोषित कुशियारा नदी के बंटवारे की व्यवस्था कई वर्षों के अंतराल के बाद भारत की सकारात्मक मंशा को दर्शाती है। तीस्ता के विषय में एक साझा समझौते पर बांग्लादेशी उम्मीदें मिथ्या हैं, लेकिन इस तरह के समझौते के न होने के कारणों को बांग्लादेश जानता है। वर्तमान में बांग्लादेश म्यांमार के दस लाख रोहिंग्या शरणार्थियों के बोझ तले दबा हुआ है। समाधान खोजने में मदद के लिए उसे भारत से बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन समस्या विकट है।

ऐसे क्षेत्र भी हैं जहां और प्रगति की जरूरत है। इनमें सशस्त्र बलों और रक्षा संस्थानों के बीच बेहतर समझ, समुद्री क्षेत्र में सहयोग और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई शामिल हैं। दोनों देशों को सुरक्षा बनाए रखने के लिए आतंकवाद, कट्टरता और उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई के क्षेत्र में सहयोग की गति को भी बनाए रखने की जरुरत है। यह पारस्परिक लाभ का विषय है, न केवल भारत बल्कि बांग्लादेश के लिए भी चिंता का विषय है, जैसा कि बांग्लादेश में कुछ लोग भी सुझाव देते हैं। एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं को निरंतर ध्यान में रखने से शत्रुतापूर्ण तीसरे देशों की भूमिका पर भी नियमित बातचीत होती है, जिनका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को बाधित करना और अविश्वास के बीज बोना है।

हमारे संबंधों में वर्तमान उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए, उन अत्यधिक कठिनाइयों को भूलना आसान है जो हमारे संबंधों ने अतीत में झेली हैं। इसलिए इस अवधि का उपयोग संबंधों को स्थिर, टिकाऊ और स्थिर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। बांग्लादेश में अलग-अलग राय है। दोनों देशों में एक नई पीढ़ी है। उन्हें भविष्य की साझेदारी बनाने में शामिल किया जाना चाहिए।

आँकड़ो से पता चलता है कि बांग्लादेश के तेजी से विकास की गति भारत के साथ उसके संबंधों में सुधार के साथ शुरू हुई है। यह दोनों पक्षों के लिए एक बुनियादी सबक है। भारत ने बांग्लादेश की सहायता के लिए भी कदम उठाए हैं, जब उसकी अर्थव्यवस्था तनाव में है, जैसे वर्तमान में यूक्रेन युद्ध के कारण ईंधन और खाद्य उपलब्धता, कीमतों पर असर और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी। मध्यावधि में, जैसे-जैसे भारत आगे बढ़ेगा, वह अपने पड़ोसियों के लिए स्थिरता और समृद्धि का भी बड़ा स्रोत बन जाएगा। बांग्लादेश संभावित रूप से इसका एक बड़ा लाभार्थी हो सकता है।

पचास साल की उम्र में बांग्लादेश ने एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उसकी संभावनाओं के विषय में संदेह करने वालों को चौकाया है। 2023 में दिल्ली में होने वाले जी20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए बांग्लादेश को निमंत्रण बांग्लादेश की सफलता के साथ-साथ भारत के साथ उसके मधुर संबंधों को भी दर्शाता है। जैसा कि दोनों देश अपने-अपने आम चुनावों की ओर अग्रसर हैं, ऐसे में यह और भी आवश्यक है कि वे अपने संबंधों पर निगरानी रखें, रक्षा करें और पिछले वर्षों की भांति गतिशील रहें।

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


(Original Article in English)
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