पर्यावरण और सामाजिक शासन के साथ मजबूती से बढ़ना
Dr Swati Mitra

केंद्रीय बजट पेश होने के बाद सातत्यता, स्वच्छ ऊर्जा तथा इससे संबंधित भारतीय कॉरपोरेट की बढ़ती भागीदारी और सरोकार, ये सारा कुछ 'सतत विकास' के व्यापक दायरे में आ गया है, जो कि अधिकांश सीईओ के बयानों में परिलक्षित होता है। यहां यह गौर करना दिलचस्प है कि कोरोना महामारी ने "बुनियादी चिंताओं" पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है, जिसे दशकों से व्यवस्थित रूप से कुचल दिया गया है और जिस पर पूंजीवाद की अधिरचना, पर्यावरण और सुशासन की घोर अवहेलना ने दुनिया को एक ऐसे महत्त्वपूर्ण बिंदु पर ला दिया है, जहां वे सारे सरोकार अब केंद्र में विराजमान हो गए हैं। यह कोई असामान्य नहीं है कि COP26 के बाद जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थुनबर्ग ने ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन को लेकर निकाली गई एक विशाल रैली का नेतृत्व करते हुए COP26 को "ब्ला ब्ला ब्ला" के रूप में सारांशित किया था। उनकी एकमात्र चिंता यह है कि दुनिया जलवायु परिवर्तन और इससे जुड़े मुद्दों पर कितनी तेजी से कार्रवाई कर सकती है। यह समस्या उन लोगों द्वारा गढ़ी गई और नजरअंदाज किए जाने का नतीजा है, जो आज इस मसले का हल निकालने में अग्रणी बने हुए हैं।

सातत्यता के व्यापक पैमाने के अंतर्गत इन्वायरन्मेंट, सोशल और गवर्नेंस (ईएसजी) का संपूर्ण सरगम 2005 में यूएनईपी पहल द्वारा गढ़े गए शब्दों का एक आकर्षक संयोजन है,जिसके गहर लक्ष्यार्थ हैं,जिस पर अगर "थोड़ा सा" भी अमल किया जाए तो वह मानव जाति के पूरे ताने-बाने को फिर से संगठित कर देगा। लेकिन पॉल पोलमैन ने जैसा कि "नेट पॉजिटिव" में उल्लेख किया है कि बोर्ड के सदस्य तक इस ईएसजी के पूरे विस्तार को पूरी तरह से नहीं समझते हैं।

अर्न्स्ट एंड यंग द्वारा किए गए एक अध्ययन में कहा गया है, जैसे-जैसे दुनिया महामारी के शुरू होने के दो साल की अवधि के करीब पहुंच रही है, कोविड-19 से संचालित पारिस्थितिकी तंत्र, और डिजिटलीकरण तो कारोबार की बाध्यता से अब उसकी प्राथमिकता बन गया है और ईएसजी उपायों पर बढ़ते जोर से कंपनियों को अपनी सातत्यता की योजनाओं पर फिर से विचार करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। टाटा समूह जैसे देश के अग्रणी व्यवसायी संगठनों का मानना है कि "ईएसजी के अनुरूप होने से टाटा समूह के निवेश के अवसरों की रेटिंग वैश्विक स्तर पर बढ़ने की उम्मीद है, जबकि संभावित रूप से इसकी उधारी लागत कम हो सकती है।" समूह के भीतर कर्मचारियों के लिए अपने नए साल के संबोधन में, अध्यक्ष पद्मभूषण एन चंद्रशेखरन ने जोर दिया कि "समूह को खुद को सरल, अधिक टिकाऊ और अधिक तकनीकी रूप से उन्नत उत्पादों के लिए आगे बढ़ते रहना चाहिए। अगर हम ऐसा करते हैं, तो हम अपनी कंपनी और अपने देश को आगे ले जा सकते हैं।"

आज ब्लैक रॉक, वेंगार्ड और स्टेट स्ट्रीट जैसे दुनिया के तीन सबसे बड़े परिसंपत्तियों का प्रबंधन करने वाले संगठनों के दिमाग में ईएसजी का ख्याल सबसे ऊपर हो गया है। उदाहरण के लिए, 2018 में ब्लैक रॉक के मुख्य कार्यकारी लैरी फ़िंक को निगमों को अपने लाभ से परे हटकर देखने और समाज में अपने योगदान पर विचार करने का आह्वान करना पड़ा है। आज अधिक से अधिक निवेशक स्थिरता के बारे में अपनी चिंता जता कर रहे हैं और इस सातत्यता को अपने कारोबार के एक मुख्य मानदंड के रूप में रख रहे हैं, हालांकि, कई संगठनों की स्थिरता रिपोर्टिंग में करने, समझने और वादा करने के बीच काफी अंतर दिखाई देता है। अर्न्स्ट एंड यंग ने पाया, "एनवायरमेंट, सोशल और गवर्नेंस (ईएसजी) की रिपोर्टिंग सीईओ के सीधे रडार के केंद्र में जा रही है, वह डिजिटल रणनीति में शामिल हो रही है, और प्रतिभा के लिए प्रतिस्पर्धात्मक युद्ध को आगे बढ़ा रही है।" यह वह जगह है,जहां ईएसजी के मानदंड या आवश्यकताओं को पूरा करने और उसको वास्तविक परिवर्तन में परिलक्षित करने की चिंता हो रही है। यह सुनकर निराशा होती है कि सातत्यता का संबंध केवल कुछ सामाजिक कार्यक्रमों से या ग्रीन गैस उत्सर्जन को मापने, इसके जिम्मेदार स्रोतों आदि से ही है और निश्चित रूप से यह किसी भी व्यवसाय समूह की चिंता के केंद्र में नहीं आता है। सरल शब्दों में कहें तो सातत्यता "दृष्टिकोण में परिवर्तन" लाने की एक प्रक्रिया है, जिसकी आज के वैश्विक परिदृश्य की तत्काल आवश्यकता है।

हाल ही में हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू द्वारा आयोजित एक वेबिनार में एंड्रयू विंस्टन और पॉल पोलमैन ने इस बारे में बात की कि निजी स्तर पर सातत्यता का अभ्यास कैसे किया जाना चाहिए? इससे मुझे अपने घर पर होने वाले कार्बन उत्सर्जन की गिनती करने का ख्याल आया। यह विचार भी आया कि मैं इसे कैसे कम कर सकता हूं? उदाहरण के लिए: यदि हम केवल छोटे घर के तीन नियमों का पालन करते हैं, जैसे कि जब जरूरत न हो तो लाइट बंद कर दें, ठोस अपशिष्ट के स्रोत से लेकर उसके निपटान का प्रबंधन करें और पानी की जरूरत न हो तो नल बंद कर दें, तो ये छोटी-छोटी गतिविधियाँ भी कार्बन फुटप्रिंट में काफी कमी ला देती हैं। केवल पर्यावरण पहलू के निष्पादन के लिए संगठनात्मक स्तर पर इसका रूपांतरण करने और आंतरिक गतिविधियों की एक पूरी श्रृंखला को तकनीकी रूप से हल करने जैसी कुछ और उपलब्धियां हासिल हो सकती हैं। हालांकि यह तभी संभव है, जब पर्यावरण के साथ सामाजिक और शासन के पहलू को भी आगे बढ़ाया जाए।

जलवायु परिवर्तन को समझने, समन्वय करने और आत्मसात करने और इसे व्यवहार में लाने के लिए यह जरूरी है कि संगठन में हर स्तर पर लोगों को शामिल किया जाए। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए आइए देखें कि भारत में अब तक ईएसजी के संबंध में 1990 के दशक के पहले क्या किया जा रहा था। जमशेदपुर (अब झारखंड) के इस्पात शहर की योजना बनाते समय टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा ने अपने बेटों को यह ताकीद की थी कि वे "तेजी से बढ़ने वाली किस्मों के छायादार पेड़ों के साथ चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनवाएं। लॉन और बगीचों के लिए काफी जगह दें।"

इसी तरह, जब टाटा समूह ने 1939 में गुजरात के अर्ध-शुष्क मीठापुर क्षेत्र में, अपने रासायनिक संयंत्रों को स्थापित करने का निर्णय लिया तो उनकी अभिनव प्रतिभा ने जल संरक्षण की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल की, जिसने न केवल नए सोडा ऐश संयंत्र लगाया बल्कि एक 10,000 लोगों को रहने लायक एक टाउनशिप को भी विकसित किया। टाटा मोटर्स ने पुणे में 1966 में अपना नया ऑटोमोटिव प्लांट बनाया। इस संयंत्र की बगल में एक झील बनाई गई थी जिसका पानी संयंत्र के अपशिष्ट उपचार प्रणाली द्वारा पूरी तरह से संशोधित कर झील में आता था। यह झील अब दुर्लभ प्रवासी पक्षियों की कई प्रजातियों के लिए एक मनोरम विहार स्थल बना हुआ है। कई टाटा कंपनियों ने अपने जल संयंत्रों का आकलन किया है और वर्षा जल संचयन, उपचारित अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग और पुनर्चक्रण, और वाटरशेड प्रबंधन जैसे जल प्रबंधन लीवर को लागू किया है।

उपरोक्त के अलावा, यूनिलीवर की सस्टेनेबिलिटी लिविंग प्लान (यूएसएलपी) इस बात का वसीयतनामा है कि कैसे पॉल पोलमैन द्वारा परिकल्पित ईएसजी को एक स्पष्ट योजना के साथ लागू किया जाता है और कैसे इसके वर्तमान सीईओ एलन जोप की अवधारणा के साथ मजबूती से बढ़ा जाता है। पोलमैन ने जैसा कि उल्लेख किया है, यूएसएलपी का उद्देश्य "व्यापार में गिरावट को रोकना और उसकी स्थापना के उद्देश्य और पहचान को फिर से खोजना था।" अपने शुभारम्भ के समय यूएसएलपी के पास एक दशक में हासिल किए जाने वाले तीन दुस्साहसिक लक्ष्य थे: -

  1. एक अरब से अधिक लोगों के स्वास्थ्य और देखभाल में सुधार करना।
  2. पर्यावरणीय दुष्प्रभाव को आधे से कम करना, और
  3. व्यवसाय की वृद्धि के माध्यम से लाखों लोगों की आजीविका में वृद्धि करना।

उपरोक्त प्रमुख लक्ष्यों के तहत व्यवसाय के लिए विशिष्ट लक्ष्यों के साथ सात उपश्रेणियां थीं, जो पोषण, ग्रीनहाउस गैस, स्वास्थ्य, जिम्मेदार सोर्सिंग, समावेशी व्यवसाय, महिलाओं के लिए अवसर और कई अन्य से लेकर थीं।

उपरोक्त दो उदाहरणों से, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि लंबे समय तक चलने वाले संगठनों ने (अ) सातत्यता को अपने व्यवसाय के केंद्र में रखा था, (ब) साहसिक लक्ष्य निर्धारित किए थे और इसके लिए (स) एक मकसद बनाया था।

उपरोक्त जैसे लक्ष्य निर्धारित करना नेतृत्व और कर्मचारियों को न केवल लाभ कमाने पर ध्यान केंद्रित करता है,बल्कि पूरे संगठन को एक उद्देश्य भी देता है। जैसा कि आईटी दिग्गज विप्रो के अध्यक्ष अजीम प्रेमजी ने ठीक ही कहा है, "यदि लोग आपके लक्ष्यों पर नहीं हंस रहे हैं, तो आपके लक्ष्य बहुत छोटे हैं।"

यह भी दर्शाता है कि अनुपालन ही उनका एकमात्र उद्देश्य नहीं था बल्कि निश्चित परिवर्तन लाना और वास्तविक सरोकार ने उनके व्यवसायों को लंबे समय तक चलने वाला बनाया और जिसकी दुनिया भर में सराहना मिली। उन्होंने लोगों की प्रशंसा जीती, सबसे उल्लेखनीय उदाहरण टाटा समूह द्वारा भारत के राष्ट्रीय वाहक एयर इंडिया के अधिग्रहण का है, जिसे देश के सभी वर्गों ने सुरक्षित हाथों में सौंपे जाना मानकर सरकार के फैसले का आदर किया है। एक औसत नागरिक के लिए टाटा का मतलब ट्रस्ट (भरोसा) है। इसी तरह, क्राफ्ट हेंज द्वारा यूनिलीवर के कथित अधिग्रहण का जनता ने कड़ा विरोध किया और अंततः इसका विचार उसे छोड़ना पड़ा। इसलिए, वर्तमान परिदृश्य में मजबूती से चलने का समय है और इसे केवल अनुपालन खेल नहीं बनाना है!

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)
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