जी-20 का वित्तीय स्थिरता बोर्ड: वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर उभरती कमजोरियां
Arvind Gupta, Director, VIF

समूह-20 के देशों ने वैश्विक वित्तीय प्रणाली में कमजोरियों का आकलन करने और उनसे निपटने के उपायों का सुझाव देने के मकसद से एक वित्तीय स्थिरता बोर्ड (एफएसबी)की स्थापना 2009 में की थी, जो इस महती जिम्मेदारी को निभाने वाली एक सम्मानित संस्था है। यह केंद्रीय बैंकों और अंतरराष्ट्रीय मानक-निर्धारण निकायों के कार्यों के बीच समन्वय स्थापित करती है और वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देने वाले प्रभावी नियामक, पर्यवेक्षी और अन्य वित्तीय क्षेत्र की नीतियों को विकसित करती है। एफएसबी 24 देशों और क्षेत्राधिकारों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, नियामकों और पर्यवेक्षकों के क्षेत्र-विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय समूहों और केंद्रीय बैंक विशेषज्ञों के विभिन्न राष्ट्रीय वित्तीय प्राधिकरणों को एक छतरी के नीचे लाती है। यह अपने छह क्षेत्रीय सलाहकार-समूहों के माध्यम से दुनिया के लगभग 70 अन्य न्यायालयों तक अपनी पहुंच बनाए रखती है।

इसके काम का दायरा जलवायु से संबंधित जोखिमों से निबटने, कोविड-19 महामारी के बाद ठप पड़े आर्थिक सुधार की शुरुआत करने, क्रिप्टो परिसंपत्तियों से उत्पन्न होने वाले जोखिमों को दूर करने, साइबर लचीलापन लाने, उभरते बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं, गैर-बैंक वित्तीय मध्यस्थता और उसकी कमजोरियों के सम्यक आकलन तक फैला है।

इसी के मद्देनजर, एफएसबी ने बाली (इंडोनेशिया) में G20 शिखर सम्मेलन से पहले, वैश्विक वित्तीय स्वास्थ्य पर अपनी एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। संस्था के प्रमुख और डी नीदरलैंड्सचे बैंक (De Nederlandsche) के अध्यक्ष क्लेस नॉट ने उभरती चुनौतियों के बारे में सार्वजनिक रूप से बात की है। एफएसबी ने वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक कार्य योजना भी विकसित की है।

नाजुक आर्थिक रिकवरी

11 मई 2022 को एक सार्वजनिक मंच से अपने संबोधन में क्लास नॉट ने यह चेतावनी दी कि कोविड संकट से आर्थिक वसूली की दर असमान और कमजोर रही है। फरवरी 2022 के अंत में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध ने आर्थिक सुधार की नाजुकता को उजागर कर दिया है। यह देखते हुए कि इस युद्ध से दुनिया में कोई उल्लेखनीय वित्तीय संकट नहीं आया है, एफएसबी ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि आसन्न वैश्विक आर्थिक मंदी वित्तीय संकट को जन्म दे सकती है।

जाहिर है कि इससे पूरी दुनिया उच्च मुद्रास्फीति के दौर की आहट सुन रही है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के कारण दुनिया भर में तेल, भोजन और ऊर्जा के दाम बढ़ गए हैं। यह स्थिति सख्त मौद्रिक स्थितियों की वजह से और उच्च ब्याज दरों के चलते आगे के आर्थिक विकास को समेटने के लिए अनिवार्य रूप से सरकारों को प्रेरित करेगी। भले ही तेल की कीमतें अपने शिखर से नीचे आ गई हैं, फिर भी वे असहज रूप से अपने उच्च स्तर पर बनी हुई हैं। कई देशों को उच्च ऋणग्रस्तता का सामना करना पड़ रहा है। यह न्यून आर्थिक संवृद्धि उनके राजकोषीय फैलाव को और सिकोड़ देगी। कमोडिटी की कीमतों में बनी उच्च अस्थिरता काउंटियों के व्यापक आर्थिक मूल सिद्धांतों को परेशान कर सकती है, जो व्यापक वित्तीय प्रणाली पर संकट का दस्तक दे सकती है।

बढ़ते जलवायु जोखिम

एफएसबी ने वैश्विक वित्तीय स्वास्थ्य के लिए कई अन्य जोखिमों को रेखांकित किया है। इसने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन वैश्विक वित्तीय स्वास्थ्य के लिए एक संरचनात्मक जोखिम की अगुवाई करता है। इसीलिए एफएसबी ने बहुत मजबूती से इस बात की अनुशंसा की है कि वित्तीय संस्थानों को चाहिए कि वे अब से जलवायु जोखिमों को अपनी उधार देने वाली पद्धतियों में शामिल करें। यहां गौर किया जा सकता है कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थान अपने उधार कार्यक्रमों में जलवायु को प्राथमिकता देना शुरू कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, 2021-2025 के लिए विश्व बैंक समूह की जलवायु परिवर्तन कार्य योजना ने सिफारिश की है कि अगले पांच वर्षों में विश्व बैंक के वित्तपोषण की औसत 35 प्रतिशत राशि जलवायु कार्रवाई के लिए समर्पित किया जाना चाहिए, जिसमें कम से कम आधा बैंक वित्तपोषण अनुकूलन और लचीलापन प्रयासों का समर्थन करे। यह अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की सोच में एक बड़े बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है।

एफएसबी ने स्वीकार किया है कि वित्तीय प्रणालियों के लिए जलवायु जोखिमों की वर्तमान समझ अभी भी प्राथमिक चरण में ही है। इसने जलवायु जोखिमों, प्रासंगिक डेटा के संग्रह, कमजोरियों के विश्लेषण और पूर्वव्यापी कार्रवाई के लिए फर्म-स्तरीय प्रकटीकरण की एक मानकीकृत प्रणाली अपनाने की सिफारिश की है।

जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को कम से कम करने के लिए स्वच्छ और हरित ऊर्जा के उपायों की आवश्यकता होती है, जो कि महंगा होने जा रहा है। जैसा कि रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है, यहां तक कि यूरोप में विकसित अर्थव्यवस्थाएं, जिन्होंने स्वच्छ ऊर्जा के लिए संक्रमण का समर्थन किया है, वे अपने आप को जीवाश्म ईंधन के उपयोग से अलग करने में असमर्थ हैं। यह परिवर्तन विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से कठिन होगा, जब ऋण देने वाले संस्थानों में इसके लिए पर्याप्त धन ही नहीं रहेगा।

क्रिप्टो एसेट्स वित्तीय स्थिरता के लिए खतरा

एफएसबी जलवायु में आ रहे बदलावों से तमाम जोखिमों के अलावा, क्रिप्टो आस्तियों को वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए एक प्रमुख खतरा मानता है। यह नोट करता है कि क्रिप्टो संपत्ति भौतिक संपत्ति द्वारा समर्थित नहीं है। वे अत्यधिक अस्थिर, अनियमित हैं, और पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली के बाहर काम करती हैं। यद्यपि क्रिप्टो संपत्ति आज समग्र वित्तीय संपत्ति का एक अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा है, लेकिन उनका मूल्य तेजी से बढ़ रहा है। इसमें चिंताजनक बात यह है कि क्रिप्टो परिसंपत्तियां पारंपरिक वित्तीय प्रणालियों के साथ विभिन्न तरीकों से जुड़ी हुई हैं। इस लिहाजन, क्रिप्टो बाजारों में कोई भी विफलता पारंपरिक वित्तीय प्रणाली को दूषित कर सकती है, और एक बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।

क्रिप्टो करंसी में किसी तरह की अस्थिरता के जोखिम को कम करने के लिए एक ‘स्टेबलकोइंस‘ का इजाद किया गया है। यह Stablecoins डॉलर, सोने, या कुछ एल्गोरिदम के लिए आंकी गई क्रिप्टोकरंसी हैं। यूएस टिथर (यूएसटी) लगभग 83 बिलियन अमरेकी डालर के बाजार मूल्य के साथ एक स्थिर क्रिप्टोक्यूरंसी है। लेकिन पता चला है कि stablecoins भी स्थिर नहीं हैं। यूएसटी मई में अस्थिर हो गया और डॉलर से खुद को अनपेक्षित कर लिया। इसी के मद्देनजर, एफएसबी ने वैश्विक स्थिर सिक्कों और अनबैक क्रिप्टो-परिसंपत्तियों के विनियमन, पर्यवेक्षण और निरीक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया है।

तकनीक पारंपरिक बैंकिंग प्रणाली पर खतरा उत्पन्न कर रही है। विकेंद्रीकृत वित्त (DeFi) एक व्यापक शब्द है, जिसका वर्णन क्रिप्टो करंसी और ब्लॉकचेन पर आधारित सम स्तर की वित्तीय सेवाओं के लिए किया जाता था, जो बैंकों और इसके अंतर्वर्तियों को पारंपरिक पाश से दूर करती है, और इसकी जगह एक वैकल्पिक वित्तीय प्रणाली की रचना करती है, जो कि बैंकों और वित्तीय नियामकों के नियंत्रण में नहीं है। वित्तीय स्थिरता बोर्ड विकेन्द्रीकृत वित्तीय सेवाओं के जोखिम और इनके वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डालता है।(डीआईएफआई की तुलना ब्लॉकचेन और क्रिप्टो करंसी आधारित हवाला प्रणाली से की जा सकती है।)

बढ़ते डिजिटलीकरण और तकनीकी नवाचार के युग में, साइबर जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। साइबर अपराध, जिसमें वित्तीय साइबर अपराध भी शामिल हैं, उसके कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को सालाना खरबों डॉलर का नुकसान होता है। एफएसबी वैश्विक वित्तीय प्रणाली के लिए साइबर जोखिम पर प्रकाश डालता है, और साइबर स्कैम की रिपोर्टिंग करने और वित्तीय संस्थानों की साइबर प्रतिक्रिया और उनकी वसूली क्षमताओं को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर देता है।

एफएसबी के काम में भारत की हिस्सेदारी

वैश्विक वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में भारत पर भी बहुत सारा दारोमदार है। चूंकि भारत इस वर्ष के अंत में जी-20 की अध्यक्षता संभालने वाला है, इसलिए इसे जी-20 के एजेंडे को एक आकार देने और वैश्विक वित्तीय संरचना में सुधार के लिए अपने विचार व्यक्त करने का अवसर मिलेगा। भारत एफएसबी का एक सक्रिय सदस्य है। इसके पूर्णाधिवेशन में तीन सीटें हैं, जिनका प्रतिनिधित्व आर्थिक मामलों के मंत्रालय में सचिव (ईए), आरबीआई के डिप्टी गवर्नर और सेबी के अध्यक्ष करते हैं। भारत अतीत में भी एफएसबी द्वारा सुझाए गए उपायों और सुधारों को लागू करता रहा है, और उसका आकलन बैंकिंग क्षेत्र के लिए बेसल III सुधारों के साथ काफी हद तक ‘अनुपालन' के लिए किया गया है। यह देखना बाकी है कि भारत जलवायु, क्रिप्टो परिसंपत्तियों और साइबर लचीलापन से संबंधित एफएसबी के नए सुझावों पर अपनी प्रतिक्रिया कैसे देता है। भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका अपना विकास एजेंडा, जिसके लिए आर्थिक विकास के साथ-साथ वित्तीय स्थिरता की आवश्यकता है, जरा भी प्रभावित न हो। यह कहना जरूरी है कि एफएसबी दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के विकास की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता है।

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>


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Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)

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