दो नगरों की कहानी: ढाका मार्च 12, 1972 और काबुल 30 अगस्त 2021
Brig (Dr) Ashok Pathak
पांच दशक और डेढ़ हजार मील की दूरी में विभाजित दो घटनाएं-

जब से अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपना तंबू समेटने का फैसला किया है, तब से समूची दुनिया के मीडिया में इस घटना का कवरेज छाया हुआ है। सबमें यही अनुगूंज है कि अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी का परिणाम क्या होगा। हालांकि हरेक कोई इस बात से सहमत है कि इस बारे में कोई निश्चित राय बनाना अभी जल्दबाजी होगी और अफगानिस्तान के भविष्य का अंदाजा लगा सकना तो और भी मुश्किल है। लेकिन हम यहां पर पांच दशक पहले ढाका (तब पाकिस्तान का पूर्वी अहम हिस्सा था और अब एक अलग व स्वतंत्र देश बांग्लादेश की राजधानी है।) से उभरे कुछ कठोर तथ्यों की तुलना अफगानिस्तान में 30 अगस्त 2021 की रात में उभरे उन कठोर तथ्यों के साथ कर सकते हैं।

इससे उन चीजों के बारे में एक स्पष्ट धारणा बनाने में आसानी होगी। यह विशेष रूप से हमें भारत और सामान्य रूप से वैश्विक भू-राजनीति को प्रभावित कर सकने वाले कई मुद्दों पर कुछ व्यापक रूप से मान्य और स्वतंत्र रूप से गपशप में उभरी कहानियों पर सवाल उठाने में मदद करेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जाने-माने और दस्तावेजी तथ्यों का विश्लेषण हमें लापरवाह सत्ता की राजनीति के नतीजों में मिले मानवीय दुखों के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकता है।

ढाका 12 मार्च 1972

भारतीय सेना की पहली राजपूत टुकड़ी का सेरेमोनियल रिट्रीट मार्च पास्ट : "हम अपने दिल और (आत्मा) से नहीं चाहते कि आप यहां से चले जाएं। लेकिन हमारा देश एक स्वतंत्र और संप्रभु देश है, और हम अपना मामला खुद ही देखेंगे। आप एक दोस्त के रूप में चले जाएं।” यह उद्गार शेख मुजीबुर्रहमान के हैं, जो उन्होंने ढाका में खचाखच भरे स्टेडियम में बंगबंधु के रूप में सलामी लेने के बाद भारतीय सेना दल को संबोधित कर रहे थे (न्यू यार्क टाइम्स 13 मार्च 1972)।[1] उनके यह कहने के ठीक अगले दिन ही सारी की सारी भारतीय सेना बांग्लादेश से कूच कर गई थी। तो इस प्रकार भारतीय सेना ने उस देश को छोड़ दिया था, जिसे उसने लगभग चार महीनों (3 दिसंबर1974 से लेकर 12/13 मार्च 1972) में पाकिस्तान के अत्याचार से मुक्त कर दिया था।

घटनाओं की श्रृंखला में 12 मार्च 1972 के वापसी समारोह के पीछे चलें तो पाकिस्तान में 7 दिसम्बर 1970 को हुए आम चुनाव में पंजाबी वर्चस्व वाली सत्ता संरचना को बुरी तरह झकझोर दिया था। केंद्रीय असेम्बली की कुल 300 सीटों में (162 पूर्वी पाकिस्तान एवं 138 सीटें पश्चिम सीमा प्रांत से आती हैं।) उनमें से शेख मुजीबुर्रहमान की अवामी लीग ने 162 सीटें जीत ली थीं।[2] इस प्रकार मुजीब के पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ हो गया था, जो पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के लिए नामंजूर था। इसलिए हुकूमत ने शेख मुजीब को जेल में डाल दिया।

इसके बाद, पाकिस्तानी सेना ने 25 मार्च 1971 को ऑपरेशन सर्च लाइट शुरू किया,जिसके जरिए अपने बंगाली नागरिकों का नरसंहार करना, उनकी महिलाओं का अपमान किया जाने लगा।[3] पाकिस्तानी सेना के अत्याचार के चलते लाखों की संख्या में लोग शरण पाने के लिए भारत आने लगे। इस पर भारत द्वारा देश और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी उठाई गई आवाजों से पाकिस्तान ने कोई ध्यान नहीं दिया। लिहाजा, भारत को शरणार्थियों की आमद रोकने के लिए मजूबर होकर अपनी सेना को लामबंद करनी पड़ी और पाकिस्तान के साथ युद्ध के लिए तैयार होना पड़ा। हालांकि पाकिस्तान ने ही सबसे पहले भारतीय सैन्य हवाई क्षेत्रों पर हवाई हमले करके युद्ध का ऐलान किया।

तो भारत ने भी पूर्वी पाकिस्तान में घुस कर उसका जवाब दिया। इस तरह, बांग्लादेश के मुक्त संग्राम की शुरुआत हो गई। जंग के बाकायदा ऐलान के ठीक 13 दिनों के बाद ही भारत ने पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान की लूटपाट करने वाली सेना को उनके घुटनों पर ला दिया था। तब पाकिस्तान की सेना में 56,998 नियमित सैनिक, 18,287 अर्धसैनिक और 16,293 पूर्वी पाकिस्तान में उस समय कार्यरत पाकिस्तान के सरकारी सेवकों ने भारतीय सेना के कमांडर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया था।[4] भारत ने शेख मुजीब को पाकिस्तानी जेल से रिहा कर रॉयल एयर फ़ोर्स के विमान में लंदन होते हुए और नई दिल्ली के रास्ते ढाका लाना सुनिश्चित किया था।[5] इसके बाद, 12 जनवरी 1972 को बंग बंधु मुजीब को बांग्लादेश के धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई गई।

बांग्लादेश युद्ध की लागत और कुछ प्रासंगिक तथ्य

विभिन्न अनुमानों के मुताबिक बांग्लादेश के निर्माण से संबद्ध घटनाओं में 2,41,000 से 2,69,000 लोगों को अपनी कुर्बानियां देनी पड़ी हैं। हालांकि बांग्लादेश की आधिकारिक घोषणा में कहा गया है कि इस पूरी लड़ाई ने 10 लाख लोगों की जान ली थी जबकि 10 लाख लोगों को शरणार्थी होना पड़ा था। पाकिस्तानी सेना ने पूर्वी पाकिस्तान में महिलाओं से बलात्कार को जंग के एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था। लगभग 300,000 महिलाओं की अस्मत लूट ली गई थी। वहीं, पाकिस्तान के 8000 सैनिक जवाबी हमले में मारे गए थे और 25000 से अधिक जख्मी हुए थे। इस मुक्ति संग्राम में भारत के 3000 सैनिक भी खेत रहे थे और 12,000 जख्मी हुए थे।[6]
बांग्लादेश के अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि मुक्ति संग्राम के नुकसान से उबरने में देश को 3 बिलियन अमेरिकी डॉलर राशि की लागत आई थी।[7]

उज्ज्वल पहलू

हालांकि अपने निर्माण जनवरी 1972 के बाद से बांग्लादेश ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसका प्रतिव्यक्ति जीडीपी 1971 के $ 133 के मुकाबले 2020 में $ 1193 हो गया है, [8] जो पाकिस्तान से कहीं ज्यादा है। [9] बांग्लादेश की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने संविधान के अनुसार नियमित चुनावों के साथ एक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बना रहा है। उसका भारत के साथ-साथ चीन से भी और अन्य देशों के साथ भी बेहतर संबंध है। दक्षिण एशिया में बांग्लादेश आतंकवाद से निपटने में कहीं अधिक सफल रहा है। वह 33वें नम्बर पर बने पाकिस्तान की तुलना में 7वें नम्बर पर है जबकि भारत इस मामले में 8वें नम्बर पर है।[10]

काबुल 31 अगस्त 2021

आखिरी अमेरिकी सैनिक हामिद करजई एयर पोर्ट काबुल से रवाना हुआ।

30 अगस्त 2021 की आधी रात को कमांडर अमेरिकी मेजर जनरल क्रिस डोनह्यू वायु सेना के परिवहन हवाई जहाज 82 यूएस एयरबोर्न डिवीजन सी-17 में सवार होकर अफगानिस्तान से कूच किया।[11] जैसे ही उनके प्लेन ने अफगानिस्तान की सरजमीं छोड़ी तालिबानी आतंकवादियों ने हवाई फायर कर आजादी का जश्न मनाया।[12]

अमेरिकी अफगानिस्तान में कैसे आए और यह स्थिति कैसे उत्पन्न हुई?

इसके पहले की स्थिति को समझने के लिए हमें इतिहास में लौटना होगा। पूर्व सोवियत संघ के कोई 30,000 सैनिकों ने 24 दिसम्बर 1979 को अफगानिस्तान की राजनीतिक स्थिति को 'स्थिर' करने के लिए वहां प्रवेश किया था क्योंकि अफगानों ने काबुल में सोवियत द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह कर दिया था। इस घटना ने अफगानिस्तान में अमेरिकी भागीदारी को बढ़ावा दिया और पाकिस्तान ने खुशी-खुशी एक प्रॉक्सी भूमिका निभाई। इसके लगभग 10 साल बाद 15 फ़रवरी 1989 सोवियत संघ को अमेरिकी हथियारों और गुप्त पाकिस्तान इंटर सर्विस इंटेलिजेंस (आइएसआइ) के समर्थन से सक्रिय मुजाहिदीन से बुरी तरह आहत होकर अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा था।[13] इस संघर्ष में 10 लाख नागरिक मारे गए थे। इनमें 90,000 मुजाहिदीन, 18,000 अफगान सैनिक और 14,500 सोवियत सैनिक मारे गए थे। लाखों लोगों ने पाकिस्तान, ईरान और कतर भाग कर शरण ली थी।[14]

सोवियत संघ के पैदा किए इस शून्य ने अफगानिस्तान को गृहयुद्ध में झोंक दिया था। 1996 में आइएसआइ के माध्यम से अमेरिका द्वारा खड़े किए गए तालिबान ने, जिसे पाकिस्तान और शायद अमेरिका ‘अच्छा तालिबान’ कहता है, उसने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। यही अमेरिका और नाटो 1999 तक आते-आते महसूस करने लगे कि तालिबान इतना अच्छा नहीं था। अल कायदा पहले ही अवतार हो चुका था। नाटो इराक के साथ उतर पड़ा था। 2001 में न्यूयार्क सिटी के जुड़वें टॉवर को अल कायदा ने हवाई जहाज से टकरा कर उन्हें ध्वस्त कर दिया था। तब तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश को इस ‘अच्छे तालिबान’ को सबक सिखाने के लिए ‘एनड्युरिंग फ्रीडम’(स्थायी स्वतंत्रता) अभियान शुरू करने के लिए सेना को आदेश देना पड़ा था। 18 सितम्बर 2001 को यह अभियान शुरू हुआ था और इसके 20 साल बाद 30 अगस्त 2021 को समाप्त हुआ। एक बार फिर पाकिस्तान ने तालिबान के विरुद्ध नाटो ऑपरेशन में सहयोगी बना। सोवियत आक्रमण के दौरान पाकिस्तान ने अमेरिकी सहायता के रूप में मिले धन और सैन्य साजो-सामान के महत्त्वपूर्ण हिस्से से अपनी झोली भर ली थी। ऑपरेशन एंड्योरिंग फ्रीडम में पाकिस्तान ने डबल एजेंट की भूमिका निभाई-यह एक ऐसा तथ्य है, जिससे अमेरिका खुद अच्छी तरह से वाकिफ है और जिसके दस्तावेजी साक्ष्य हैं, लेकिन फिर भी शो चलता रहा। आखिरकार अमेरिकी सैनिकों ने अफगानिस्तान छोड़ दिया पर इस पूरे एंड्योरिंग फ्रीडम ऑपरेशन के दौरान 47,245 नागरिक मारे गए, उसे 2448 सैनिकों से हाथ धोना पड़ा, 3846 मिलिट्री कॉन्ट्रैक्टर मारे गए, नाटो सहयोगियों के 1144 कर्मी मारे गए। इसके अलावा, 66,000 अफगानी सैन्य पुलिस और 51,191 तालिबानी लड़ाके भी मारे गए थे। लाखों लाख अफगानिस्तानी भाग कर पाकिस्तान और अन्य देशों में शरण लेनी पड़ी है, जहां वे भाग कर जा सकते थे।[15] दुर्भाग्य से कोई भी देश अफगानिस्तानियों को शरणार्थी के रूप में स्वीकार करने के लिए राजी नहीं था। अब यही अफगानिस्तान एक बार फिर तालिबान के अधीन है।

तुलनात्मक तथ्य
समानताएं

पाकिस्तानी सेना ने1971 में असहाय बांग्लादेशी नागरिकों के खिलाफ अपराध की साजिश रची थी। उसने इस भूमिका को 1979 से लेकर 2021 तक अफगानिस्तान में दोहराया-पहले वहां के अधिकाधिक युवाओं को अत्यधिक कट्टर धार्मिक कट्टरपंथियों से युक्त आतंकवादी बनाने और फिर उन्हें अफ़ग़ानिस्तान में तबाही मचाने के काम में जोत कर।

अमेरिका दोनों ही मामलों में उदार लोकतांत्रिक मूल्यों के गलत पक्ष में फंस गया था। 1971 में उसने पूर्वी पाकिस्तान के निर्दोष बंगालियों के संहार में शामिल पाकिस्तान के तात्कालीन सैन्य शासन का पक्ष लिया था। फिर उसने भारत को डराने के लिए अपने सातवें बेड़े को बंगाल की खाड़ी में भेज दिया था, जबकि पाकिस्तानी सेना ढाका में आत्मसमर्पण कर दिया था।[16] इसके ठीक 50 साल बाद अमेरिकी सेना ने अफगानों को धोखा दिया, जिन्होंने तालिबान के खिलाफ युद्ध जीतने में उनकी मदद की। अफगानिस्तान से उड़ान भरने वाले परिवहन विमानों पर अफगान नागरिकों के चढ़ने और उड़ान भरने के दौरान विमान से गिरने की तस्वीरें अमेरिका के इस स्मारकीय विश्वासघात की भयावहता को कई गुना बढ़ा देती हैं।[17]

चूंकि बांग्लादेश में निर्दोष नागरिक आबादी मारी जा रही थी, उनकी संपत्ति नष्ट कर दी गई थी और उनकी महिलाएं अपमानित की गई थीं फिर भी संयुक्त राष्ट्र संस्था 1971 के मार्च से लेकर दिसम्बर तक विनाश के इस नासमझ खेल को समाप्त करने में असहाय दिख रही थी, और फिर अफगानिस्तान में 15 अगस्त 2021 को जब तालिबान ने उसकी राजधानी काबुल पर अधिकार कर लिया, तब भी वह उतनी ही निस्सहाय दिखी।

इन दोनों ही प्रकरणों में महिलाएं एवं बच्चे बुरी तरह पीड़ित हुए थे।

मुक्त विश्व के नेतृत्व का दावा करने वाले राष्ट्रों को इन पीड़ित देशों में उसकी रक्षाहीन आबादी की कीमत पर सैन्य और आर्थिक शक्ति के लापरवाह उपयोग में लिप्त देखा गया।

दोनों घटनाओं में भिन्नताएं

इन दोनों देशों में, बांग्लादेश का ऑपरेशन छोटा तेज और सटीक था। इतने कम समय में किसी भी सैन्य अभियान ने इतना कुछ हासिल नहीं किया है, जिसमें मामूली संपार्श्विक क्षति हो। यह एक ऐसा ऑपरेशन था जिसमें उत्कृष्ट युद्धाभ्यास और धोखे के साथ उत्कृष्ट मनोवैज्ञानिक युद्ध की विशेषता निहित थी। चीफ ऑफ स्टाफ ईस्टर्न कमांड ने पाकिस्तानी शीर्ष सैन्य कमांडरों और मार्शल लॉ प्रशासक के मुख्यालय में घुस कर उनसे कहा कि उनके पास एक ही विकल्प है-युद्ध क्षेत्र में भारतीय सेना के कमांडर के आगे बिना शर्त आत्मसमर्पण। इसके आधे घंटे बाद मेजर जनरल (जो बाद में लेफ्टिनेंट जनरल बने) जेएफआर जैकब द्वारा खेले गए सबसे दुस्साहसी मनोवैज्ञानिक खेल ने लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाज़ी की लड़ने की इच्छा को तोड़ कर रख दिया। उन्हें इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि जब वे आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हुए तब उनकी 8000 फौज ढाका की हिफाजत में तैनात थी,जबकि उस वक्त भारत के महज 3000 सैनिक ही ढाका के आसपास थे।[18] जब पाकिस्तानी सैनिकों को आत्मसमर्पण की घोषणा के बारे में पता चला तो वे हैरान रह गए क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना की बड़ी तादाद तैनात थी और एक और महीने तक लड़ने के लिए वह पूरी तरह से फिट थी।[19]

भारतीय राजनीतिक सैन्य नेतृत्व ने मनोवांछित नतीजा हासिल किया और इस विजय को चार दशकों से अधिक समय तक बनाए रखा। इस युद्ध के बाद मामूली हिंसा हुई।

एक हास्यास्पद लोकतंत्र और एक दुष्ट राज्य के रूप में पाकिस्तान के पाखंड का पर्दाफाश हुआ, जो अपने ही लोगों की हत्या कर रहा था।

महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष

इन विप्लव देखे मेजबान देशों में लोकप्रिय मजबूत नेतृत्व की जरूरत है। बांग्लादेश में मिली असाधारण ऐतिहासिक सफलता और अफगानिस्तान में बड़ी विफलता मेजबान देश में लोकप्रिय और दूरदर्शी नेताओं की अहमियत को सामने लाती है। शेख मुजीब बांग्लादेश के लिए ऐसे ही नेता थे। अफगानिस्तान उस तरह का कद्दावर एवं प्रगतिशील नेतृत्व देने में विफल रहा जो आंतरिक कबायली युद्धों को समाप्त कर सके और अफगानिस्तान को पाकिस्तान के बुरे मंसूबों से महफूज रख सके।

आम नागरिकों को सम्मान देना चाहिए। एक राष्ट्र की निहत्थे और शांतिप्रिय आबादी सबसे शक्तिशाली संपत्ति है। उनका सम्मान करने और उन्हें संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। पाकिस्तान, रूस और अमेरिका अफगानिस्तान में ऐसा करने में विफल रहे जबकि भारत ने इस नैतिक आचरण का पालन किया।

संपार्श्विक क्षति को कम करना चाहिए। को न्यूनतम संपार्श्विक क्षति के साथ आधुनिक युद्धों को सटीक लक्ष्यीकरण की अवधारणा से निर्देशित करने की आवश्यकता है। इस सिद्धांत का पालन बांग्लादेश में किया गया जबकि अफगानिस्तान में उल्लंघन। बांग्लादेश में भारतीय ऑपरेशन ने शरणार्थियों की उनके घरों में वापसी का मार्ग प्रशस्त किया। अफगानिस्तान में रूसी, पाकिस्तानी और अमेरिका की भागीदारी का प्रभाव इसके ठीक विपरीत था।

देश पर नियंत्रण नहीं करें, उन्हें सक्षम बनाएं। कोई विदेशी हस्तक्षेप किसी राष्ट्र को अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए सक्षम नहीं कर सकता है जबकि यह अफगानिस्तान में 1979 से ही हो रहा है।
लोगों को और उनके नेतृत्व को अपना समाधान खुद ही खोजने दिया जाना चाहिए। एक विचारधारा, धार्मिक सिद्धांत और राजनीतिक संस्कृति थोपने के बाहरी प्रयास विफल होने के लिए ही जाने जाते हैं। इसके मौजूदा उदाहरण हैं-वियतनाम, इराक, हांगकांग, तिब्बत, ईरान, अफगानिस्तान आदि देश। देश के लोग और उनका नेतृत्व एक ऐसा संतुलन ढूंढ़ते हैं, जो अधिक शांतिपूर्ण और टिकाऊ हो। इराक ने सद्दाम हुसैन की हुकूमत के तहत, वियतनाम ने हो ची मिन्ह की अगुवाई में और दक्षिण अफ्रीका ने नेल्सन मंडेला के दूरदर्शी नेतृत्व में बेहतर प्रदर्शन किया था। भारत ब्रिटिश साम्राज्य काल में तीन फीसदी रही उसकी न्यूनतम जीडीपी दर स्वतंत्र भारत में तीन गुनी हो गई है।

पाद-टिप्पणियां

[1]शेख मुजीबुर्रहमान ने भारतीय सैनिकों के बांग्लादेश छोड़ने के पहले ढाका में रिट्रीट मार्च पास्ट को संबोधित (12 March 1972) किया। https://www.nytimes.com/1972/03/13/archives/indias-soldiers-quit-bangladesh-ceremonies-in-dacca-mark-pullout.html
[2]1970 में वाटरशेड मोमेंट इन 1970. इलेक्शन दैट ब्रोक पाकिस्तान, राजा नईम 7 दिसम्बर 2020 https://thewire.in/south-asia/elections-that-broke-pakistan-1970-history
[3]ब्लैक नाइट मार्च 25 , 1971 https://www.thedailystar.net/frontpage/the-black-night-73596
[4]एस एन प्रसाद, यूपी थपलियाल “इंडिया पाकिस्तान वार ऑफ 1971 ए हिस्ट्री” नटराज पब्लिसिंग 2014 ISBN 97881582379
[5]हाऊ बंगबंधु फ्ल्यू इनटू लंदन शखावतलिटन 11 जनवरी 2016 https://www.thedailystar.net/op-ed/politics/how-bangabandhu-flew-london-199858
[6]269000 पीपुल्स डाइड इन बांग्लादेश वार सेज न्यू स्टडी वार https://timesofindia.indiatimes.com/world/rest-of-world/269000-people-died-in-bangladesh-war-says-new-study/articleshow/3147513.cms
[7]बंगाली ईकोनॉमिस्ट पुट्स कॉस्ट ऑफ रिकवरी फ्रॉम वार एज $3 बिलियन 6 जनवरी 1972 https://www.nytimes.com/1972/01/06/archives/bengali-economist-puts-cost-of-war-recovery-at-3billion-bangladesh.html
[8]राइज ऑफ जीडीपी पर कैपिटा बांग्लादेश https://data.worldbank.org/indicator/NY.GDP.PCAP.CD?locations=BD
[9]पर कैपिटा पाकिस्तान 2020 पर कैपिटा पाकिस्तान 2020 https://data.worldbank.org/indicator/NY.GDP.PCAP.CD?locations=PK $1482 in 2018, $1193 in 2020
[10]ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स टॉप 50 कंट्रीज 2020 https://www.statista.com/statistics/271514/global-terrorism-index/
[11]दि लॉस्ट सोलजर लीविंग अफगानिस्तान-निकनेम्ड फ्लैटलाइनर, वाज यूनिक्ली प्रिप्रेयर्ड फॉर दि मोमेंट इलिशा फिल्डस्टड्ट 02 सितम्बर 2021 https://www.nbcnews.com/news/world/last-soldier-leave-afghanistan-nicknamed-flatliner-was-uniquely-prepared-moment-n1278260
[12]तालिबान सेलिब्रेट विक्टरी एज लॉस्ट यूएस ट्रूप्स लीव अफगानिस्तान https://www.aljazeera.com/news/2021/8/30/white-house-confirms-kabul-airport-rocket-attack-live-news
[13]सोवियत इनवेशन ऑफ अफगानिस्तान 1979 https://www.britannica.com/event/Soviet-invasion-of-Afghanistan
[14]सोवियत वार इन अफगानिस्तान 1979 टू 1989 https://www.theatlantic.com/photo/2014/08/the-soviet-war-in-afghanistan-1979-1989/100786/
[15]मॉस मर्डर इन अफगानिस्तान: 40 इयर्स ऑफ कनफ्लिक्ट्स 18 दिसम्बर 2020 , मीग क्रैमर, इंस्टिट्यूट ऑफ वर्ल्ड पॉलिटिक्स https://www.iwp.edu/articles/2020/12/18/mass-murder-in-afghanistan-40-years-of-conflict/
[16]वही 4 ‘सेवेन्थ फ्लीट इंटर्ड वे ऑफ बंगाल’ Pp 407
[17]केओस डेस्पेरेशन एट काबुल एज बाइडेन डिफेंड्स विदड्राल फ्रॉम अफगानिस्तान https://www.reuters.com/world/asia-pacific/talibans-rapid-advance-across-afghanistan-2021-08-10/
[18]लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब” सरेंडर एट ढाका बर्थ ऑफ ए नेशन” मनोहर पब्लिशर्स 1997 ISBN 817304189 नई दिल्ली (Pp 143 to 147)
[19]मेजर जनरल हकीम अरशद कुरैशी“दि 1971 इंडो पाक वार ए सोल्जर्स नैरेटिव” ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस 2002, ISBN 0195797787

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>

Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)


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