भारतवर्ष का विचार
Dr Dilip K. Chakrabarti, Editor, VIF History Volumes

एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जिसको अपने भारतीय पासपोर्ट पर पाकिस्तान की यात्रा करना लगभग असंभव है, मैंने यूटूब पर उपलब्ध वीडियोज को बार-बार देखते हुए खुद को पाकिस्तानी पर्यटक पाया है। मैं अब जानता हूं, उदाहरण के लिए, कि मकरान के समुद्री तट के पश्चिमी छोर पर बसे ग्वादर के पुराने क्वार्टर में बनी करीम की चाय की दुकान वहां की सड़क के किनारे बनी-सजी चाय की सैकड़ों दुकानों में बेहद खास है, यह वैसा नजारा है, जिससे कि हम भारत में नियमित रूप से दो-चार होते हैं। मुल्तान के मैदान के पास गन्ने की रस की दुकान में और हरियाणा के हिसार से कोई अंतर नहीं होगा। एक भारतीय के रूप में, ग्वादर में उस चाय की दुकान में या मुल्तान के निकट ‘गन्ना रस विक्रेता’ के साथ मुझे बिल्कुल अपने घर भारत में होने का अहसास होना चाहिए। यहां एक अपरिहार्य एवं संवेदनाओं से लबरेज यह सवाल मेरे जैसे ब्रिटिश भारत में पैदा हुए बच्चे के जेहन में आता है: कैसे पृथिवी पर बना यह एक समूचा और अविभाज्य उपमहाद्वीप परस्पर दो शत्रुतापूर्ण देशों में बांट दिया गया-एक दूसरे के यहां आवाजाही पर पीड़ादायक प्रतिबंधों के साथ? इस सवाल का जवाब बंटवारे के इतिहासकारों को देने दें लेकिन यह आकलन करना कम दिलचस्प नहीं होना चाहिए कि भौगोलिक रूप में भारतीय उपमहाद्वीप कब तक एक समूचा और अविभाज्य रहा है और धरातलीय स्तर पर जीवन जिए जाने के रूप में भी।

जहां तक इस लेख का संबंध है, तो विष्णुपुराण और भौगोलिक बुनावटों की सूचियों एवं लोगों के वर्णनों और महाभारत में विभिन्न देशों एवं भूखण्डों के साक्ष्य-विवरणों से इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि जब इन ग्रंथों को उनके वर्तमान उपलब्ध रूपों में लिखा गया था, तब तक पूरा उपमहाद्वीप एक सुव्यवस्थित भौगोलिक इकाई था। इसमें भी कोई संदेह नहीं था कि “समुद्र के उत्तर और बर्फीले पहाड़ के दक्षिण में स्थित इस देश को भारत कहा जाता है, क्योंकि यहां राजा भरत के वंशज रहते थे।” ( बुक II, अध्याय 3, विष्णुपुराण में भारतवर्ष-वर्णन का प्रसंग)। इन पाठों की निश्चित तिथियां अज्ञात हैं किंतु उनके केंद्रबिंदुओं को विगत ईसा पूर्व की अंतिम सदियों एवं ईसा बाद की चौथी-पांचवीं सदी के बीच माना जा सकता है। इस काल-अवधि के दौरान यह उपमहाद्वीप, जिससे हम सब अवगत हैं,वह एक एकीकृत भौगोलिक अवधारणा था।

हम भूगोल के प्रति इस समझ को काल के दृष्टिकोण से कितना पीछे ले जा सकते हैं? मैंने एस कल्याणरमन से जाना है कि भारत के लोग का संदर्भ ऋग्वेद III.53.12 के जितना ही प्राचीन है, जिसमें कहा गया है: “विश्वामित्र की यह प्रार्थना भारत की प्रजाति को सुरक्षित करती है(ग्रिफ्फिथ का अनुवाद; भारत जन्म मूल)। इसी खंड के 24 नम्बर के दूसरे पद में भरत के पुत्रों को भारतपुत्र कहा गया है। इन दोनों ही संदर्भों-जन्म एवं पुत्र-में ‘भारत की संतान’ भावना के रूप में उल्लेख किया गया है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि ऋग्वेद के भी काफी पहले से लोग भारतवर्ष को एक भौगोलिक इकाई के रूप में जानते थे, जिसका अर्थ है कि इस भूमि की अवधारणा भारतीय विचार की शुरुआत के साथ जुड़ी हुई है।

यह भी एक बड़ी पुरातात्विक अभिव्यक्ति है जिसका मैं अपने इस लेख में विचार करूंगा। यह पुरातात्विक अभिव्यक्ति सिंधु सभ्यता के रूप में है, जो हमारे लिए, भारत की महान परम्परा का उद्गमस्थल है। हमारा दावा इसके भौगोलिक स्थान एवं कालानुक्रमिक-विस्तार दोनों पर ही आधारित है।

यह भौगोलिक क्षेत्र अफगानिस्तान में ऑक्सस घाटी में शॉर्टुघई से लेकर एक तरफ महाराष्ट्र की गोदावरी घाटी में दाइमाबाद तक फैला हुआ है, और दूसरी तरफ, यह पाकिस्तानी और ईरानी बलूचिस्तान सीमा के बीच स्थित सुतक्गेंडोर से लेकर हरिद्वार (उत्तराखंड) में गंगा तट के किनारे स्थित मनसा देवी की पहाड़ी के नीचे तक जाता है। भले ही कोई अफगानिस्तान को इस क्षेत्र से निकाल ले, पर इसकी उत्तर-दक्षिण धुरी का विस्तार जम्मू में मांडा के स्थल से लेकर महाराष्ट्र में दाइमाबाद तक की लंबाई तक है। हाल के वर्षों में महाराष्ट्र में जलगाँव के पास से सिंधु काल से जुड़े मिट्टी के बर्तन मिले हैं। इस भौगोलिक तथ्य को जब कोई जोड़ता है, तो ओसीपी का फैलाव-कॉपर होर्ड्स, यानी एक कलाकृति संयोजन जो निश्चित रूप से उत्तरार्ध-हड़प्पा कालक्रम और सांस्कृतिक कक्षा से संबंधित है, यदि यह हड़प्पा परंपरा के परिपक्व होने के पहले का नहीं है, तो भी इस भौगोलिक स्थान के बारे कहा जा सकता है कि यह समूचे गंगा-यमुना दोआब से लेकर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के करीब श्रृंगवेरपुर तक फैला हो सकता है। अकेले इसके भूगोल का विचार ही किसी को भी यह विश्वास दिलाने के लिए काफी है कि यह पुरातात्विक परंपरा उपमहाद्वीप में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ी सभ्यतागत वृद्धि का प्रतीक है।

इस संदर्भ में विचार करने के लिए दूसरा बिंदु कालानुक्रमिक स्तंभ है, जो भिराना और राखीगढ़ी जैसे स्थलों पर इस सभ्यता के विकास और परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। मूल रूप से, इन स्थलों के कालानुक्रमिक और सांस्कृतिक स्तंभ लगभग 7000 ईसा पूर्व से लेकर 1200/1300 ईसा पूर्व तक सिंधु परंपरा के विकास की कहानी को सारांशित करते हैं। अकेले इन स्थलों की बात नहीं है; इस उपमहाद्वीप के पूरे उत्तरी और उत्तर-पश्चिमी खंड के संयुक्त पुरातात्विक साक्ष्य, राजस्थान-गुजरात के अरावली क्षेत्र में कृषि की शुरुआत के निर्विवाद प्रमाण सहित, एक ही कहानी कहते हैं।

हम इस बात पर जोर देते हैं कि इस भौगोलिक और कालानुक्रमिक परिमाण का सभ्यतागत विकास विभिन्न प्रकार के संसाधनों को प्राप्त करने की अपनी खोज में उपमहाद्वीप के किसी भी हिस्से को अछूता नहीं छोड़ा होगा। भिन्न-भिन्न रूपों में, यह लंबे समय से स्पष्ट है कि; यहां जॉन मार्शल की मोहनजोदड़ो रिपोर्ट के पहले खंड में प्राकृतिक कच्चे माल के बारे में एडविन पास्को द्वारा लिखे गए प्रसिद्ध अध्याय की याद कर सकता है, जहां यह कहा गया है कि इस स्थल पर लगे अमेजन पत्थरों को (अमेजोनाइट) संभवतः सुदूर दक्षिण में स्थित नीलगिरी से लाया गया था।

अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस सभ्यता ने व्यापक स्थान और समय का प्रतिनिधित्व किया है, जो भारत की साहित्यिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं के साथ बड़े करीने से फिट बैठता है, जो वैदिक ग्रंथों के स्तंभ और इस बाद के असंख्य पाठों में मिलता है, जो पारंपरिक रूप से वैदिक ग्रंथों से जुड़ा हुआ है। हमें यह महसूस करना चाहिए कि वैदिक ग्रंथों का सार, जब कोई कथित आर्यों से अपने जुड़ाव को भुला देता है, अपने में एक भारतीय साहित्यिक परंपरा थी, और इसकी तवारिख जो भी हो, इसे गंगा के मैदान में प्रारंभिक ऐतिहासिक शहरी विकास की शुरुआत होने के पहले प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के दिनांक-कोष्ठक में रखना होगा। दोनों एक साथ-पुरातात्विक विकास के स्तंभ और साहित्यिक विकास के स्तंभ-को अंततः हमारे भारतीय ऐतिहासिक आख्यान का आधार कहा जा सकता है। हमें इस पर तार्किक रूप से विचार करने में देरी हुई है लेकिन सच तो यह है कि हम इस बिंदु पर विचार करने में अंततः सक्षम हुए हैं कि यहां से हम प्राचीन भारत और भारतवर्ष के विचार की उत्पत्ति को जान सकते हैं, यही इस बारे में एक महत्त्वपूर्ण अनुभूति है।

(The paper is the author’s individual scholastic articulation. The author certifies that the article/paper is original in content, unpublished and it has not been submitted for publication/web upload elsewhere, and that the facts and figures quoted are duly referenced, as needed, and are believed to be correct). (The paper does not necessarily represent the organisational stance... More >>

Translated by Dr Vijay Kumar Sharma (Original Article in English)


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