आतंकवाद से आतंक तकः अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चिंताजनक घटनाक्रम
Alvite Singh Ningthoujam

आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) के कब्जे वाले क्षेत्र जब से वापस हासिल किए जाने लगे हैं, तभी से तमाम विश्लेषणों में संगठन का खात्मा होने के अनुमान लगाए जाने लगे हैं। तथाकथित खिलाफत में तेजी से घटते वित्तीय संसाधन तथा विदेशी लड़ाकों की संख्या में कमी के कारण भी ऐसी भविष्यवाणी की जा रही हैं। आईएसआईएस की धमक के बारे में जो चर्चा चल रही है, उसमें कुछ सचाई है, लेकिन इस चरमपंथी विचारधारा की पूरी तरह हार के आसार दूर-दूर तक नजर नहीं आते। साथ ही साथ इस बात में भी संदेह है कि दुनिया भर से लड़ाकों और समर्थकों को आकर्षित करने के लिए संगठन जिस आध्यात्मिक एवं वैचारिक आधार का सहारा ले रहा है, उसे वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय समझने की कोशिश कर रहा है, जिस पर इस घटना का अच्छा खासा प्रभाव पड़ा है। संगठन की घातक विचारधारा को जवाब नहीं दिया जा रहा है, इसलिए इसका वजूद कुछ अरसे तक बचा रहेगा।

सीरिया और इराक में आईएसआईएस के दबदबे वाले इलाकों पर मिल-जुलकर जो सैन्य कार्रवाई की जा रही है, वह उसके लड़ाकों पर जबरदस्त दबाव डाल रही है। लेकिन उसके साथ ही पश्चिम एशिया से परे कुछ ऐसी गतिविधियों को अंजाम दिया जा रहा है, जिन पर विचार करना होगा। पहली घटना है, अच्छी तरह प्रशिक्षित लड़ाकों का बड़ी तादाद में अपने-अपने देश लौटना। दूसरी घटना है अमेरिका और यूरोप दोनों स्थानों पर समाज से अलग-थलग रहने वालों के द्वारा हमलों में बढ़ोतरी। यह खास चलन है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंता बहुत बढ़ रही है क्योंकि आईएसआईएस ऐसे ढेरों असंतुष्ट व्यक्तियों और आतंकी गुटों को आकर्षित कर रहा है, जो अब भी इसी भ्रम में हैं कि दुनिया भर में खिलाफत कायम की जा सकती है।

पहले आतंकवाद का अर्थ पहले से मौजूद उन संगठनों द्वारा होने वाले समन्वित हमले था, जिनके पास नुकसान पहुंचाने के सभी साधन थे। लेकिन अनजान गुपचुप लोगों की भर्ती से तस्वीर बदल रही है क्योंकि उनकी हरकतों को भांपना और रोकना बहुत मुश्किल है। पश्चिमी दुनिया में ज्यादातर हमले या तो आईएसआईएस के सदस्यों ने किए हैं या अलग-थलग रहने वाले उन लोगों ने किए हैं, जिन्होंने इस संगठन से ही प्रेरणा ली है। उन लोगों की हरकतें भी इस संगठन के पक्ष में ही गई हैं, जो पूरी दुनिया में अपने पांव पसारने की कोशिश लगातार कर रहा है।

लौट रहे विदेशी लड़ाके अपने-अपने देश में सुरक्षा के लिए जो चुनौती खड़ी करेंगे, उस पर चिंता बढ़ रही है। इराक तथा सीरिया में लड़ाकों की आमद में अच्छी खासी कमी आने से यह सवाल लगातार खड़ा होता रहा है कि “आतंकवाद का खतरा वाकई में कम हो रहा है या अधिक खतरनाक नए चरण की शक्ल अख्तियार करता जा रहा है।”1 वापस जाने वालों की प्रासंगिकता अब महसूस होती है क्योंकि हो सकता है कि नया चरण शुरू होने वाला हो। संभावना है कि वापस जाने वाले ये लड़ाके उन चरमपंथियों के साथ हाथ मिला लें, जिन्हें विदेश जाने का मौका नहीं मिला था। दूसरे शब्दों में कहें तो वापसी से उन देशों में हिंसक चरमपंथ की समस्या बढ़ने की आशंका है।

ऐसी वापसी के कारण उठ रही चिंताएं ट्यूनीशिया, सऊदी अरब, रूस, तुर्की और जॉर्डन (जहां से सबसे बड़ी तादाद में विदेशी लड़ाके आईएसआईएस में भर्ती हुए थे)2 में ही गंभीर रूप धारण नहीं करेंगी बल्कि यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में भी ऐसा ही होगा। समस्या सीरिया या इराक की ओर जाने वालों से ही नहीं बल्कि उनसे भी खतरा है, जो संगठन के दबदबे वाले इलाकों से भाग रहे हैं। साथ ही यह भी स्वीकार करना होगा कि “लौटने वाले सभी विदेशी लड़ाके लड़ते रहने या वैश्विक जिहादियों की अगली पीढ़ी तैयार करने के इच्छुक नहीं होंगे,”3 लेकिन ऐसी मंशा वालों की छोटी सी तादाद को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता। उनमें से कुछ भी अब भी लगता है कि “वे जो कर रहे हैं, सही कर रहे हैं।” यूरोप में ऐसा ज्यादा हो रहा है, जहां उग्रवाद में जबरदस्त इजाफा हुआ है। सिडनी के लोवी इंस्टीट्यूट द्वारा कराया गया एक अध्ययन सीरिया और इराक में भावी विदेशी लड़ाकों को चार श्रेणियों में रखता है और ये श्रेणियां निम्नलिखित हैं: “...जो सीरिया और इराक में रहना चाहते हैं; जो स्वदेश में या कहीं और हिंसक जिहाद जारी रखने के लिए देश छोड़ते हैं; जो अपने देश लौटना चाहते हैं; और जो पनाह मांगने तीसरे देश में जाते हैं...।”4 इनमें से भी किसी भी श्रेणी पर नजर रखना कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए बहुत दुष्कर है।

हाल में हमलों में आई तेजी को देखते हुए यूरोपीय संघ के देशों तथा अमेरिका के सुरक्षा अधिकारियों ने आईएसआईएस की सैन्य पराजयों के संभावित नतीजों के बारे में अपनी चिंताएं जाहिर की हैं। फ्रांस में खतरा बहुत अधिक है, जो साल भर के भीतर कुछ निर्मम हमले झेल चुका है। वहां के प्रधानमंत्री मैनुएल वाल्स ने जिक्र किया है कि “फ्रांस के या फ्रांस में रहने वाले करीब 700 जिहादी इस वक्त इराक और सीरिया में हैं” तथा “उनकी वापसी हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक और खतरा बन रही है... यह लड़ाई लंबी चलेगी।”5 आईएसआईएस से जुड़े अकेले अपराध करने वालों की गतिविधियों तथा ऐसी ही अन्य डरावनी घटनाओं की खबर पिछले कुछ महीनों में बेल्जियम, जर्मनी और अमेरिका में बड़े पैमाने पर देखी गई हैं। उनमें से कुछ आईएसआईएस के निर्देश पर की गई थीं या उससे प्रेरित थीं, लेकिन कुछ ऐसे मामले भी थे, जहां संगठन और अपराधियों के रिश्ते न के बराबर थे। अभी तो मानसिक रोग, हिंसक प्रवृत्ति और धर्म के नाम पर उग्रवाद की ऐसी भयानक घुट्टी है, जो चरम पर है और जिसके कारण आतंकवाद की घटनाएं हो रही हैं।

अलग-थलग अकेले लोगों द्वारा हमलों की घटनाएं नागरिकों के बीच लगातार डर भरती जा रही हैं। उनके शिकार लोगों को देखकर और उनका निशाना बने स्थानों मसलन पब, थिएटर, मॉल, रेलवे स्टेशन, हवाईअड्डे आदि को देखकर डर और भी बढ़ जाता है। न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी में हाल ही में हुई बमबारी, मिनेसोटा मे चाकूबाजी की घटनाएं ऐसे रुझान को दर्शाती हैं। किंतु अहमद खान रहमी और दाहिर अदान नाम के हमलावरों के आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठनों से रिश्ते की पुष्टि अभी हो नहीं सकी है। अकेले हमले करने वाले प्रेरित लोगों और सीरिया या इराक में अपने आकाओं के कहने पर काम करने वाले आतंकियों के बीच कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो “दोनों चरम ध्रुवों के बीच कहीं काम करते हैं।”6 चूंकि आईएसआईएस ने ऐसे कई हमलावरों को अपना “सिपाही” बताया है, इसलिए मामले की तह तक जाने और उनकी बात को चुनौती देने के लिए गहन जांच की जरूरत है। किंतु उनकी उपस्थिति आतंकवादरोधी एजेंसियों के लिए लगातार गंभीर समस्या बनती जा रही है। संघीय जांच ब्यूरो (एफबीआई) के निदेशक जेम्स कॉमी ने सही कहा है, “तथाकथित खिलाफत को कुचल दिया जाएगा। चुनौती यह होगी कि उसमें से सैकड़ों बहुत, बहुत खतरनाक लोग निकलेंगे। वे सीरिया और इराक में जंग के मैदानों में नहीं मारे जाएंगे। अगले दो से पांच वर्ष में आतंकियों का ऐसा समुदाय होगा, जैसा हमने पहले कभी नहीं देखा है।”7

अंतरराष्ट्रीय समुदाय पश्चिम एशिया में आईएसआईएस के प्रभाव में कमी को देखकर लापरवाही नहीं बरत सकता। संगठन जिस तरह अपना आधार खो रहा है, उसे देखते हुए वह मूल क्षेत्रों में आतंक को हवा दे सकता है और उसके भागते हुए लड़ाके अपने-अपने देश में छिटपुट हमले कर सकते हैं। विभिन्न देशों में पैदा हो रहे उग्रवाद को देखते हुए बाद वाली बात बहुत चिंता भरी है। इन चरमपंथी गुटों का नजर नहीं आना सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती है। चरमपंथी लोगों, लौटकर आए लड़ाकों और आतंकियों की ओर से आने वाले खतरे को देखते हुए सुरक्षा के संबंध में अधिक सतर्कता बरते जाने की तथा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। यह समझना चाहिए कि खतरे अब सीधे हमलों से नहीं बल्कि प्रेरित हमलों से हैं और तेजी से फैल रहे हैं। अंत में विदेशी लड़ाके जब अपने घर जाएंगे तो साथ में आतंकी विचारधारा भी लेकर जाएंगे।

संदर्भ

  1. ग्रिफ विट एवं अन्य, “फ्लो ऑफ फॉरेन फाइटर्स प्लमेट्स एज इस्लामिक स्टेट्स लूजेज इट्स एज”, द वॉशिंगटन पोस्ट, 9 सितंबर 2016
  2. विस्तृत जानकारी के लिए देखें, “फॉरेन फाइटर्सः एन अपडेटेड असेसमेंट ऑफ द फ्लो ऑफ फॉरेन फाइटर्स इनटु सीरिया एंड इराक”, द सूफान ग्रुप, दिसंबर 2015
  3. लिज बुर्के, “रिटर्न्ड जिहादिस्टः द हॉरर दैट कम्स आफ्टर इस्लामिक स्टेट”, News.com.au, 28 सितंबर 2016
  4. लाइदिया खलील एवं रोजर शैनाहन, “फॉरेन फाइटर्स इन सीरिया एंड इराकः द डे आफ्टर”, लोवी इंस्टीट्यूट, सितंबर 2016, पृष्ठ 7
  5. “टिकिंग टाइम बम ऑफ फॉरेन आईएसआईएस फाइटर्स रिटर्निंग होम”, एनडीटीवी, 9 सितंबर 2016
  6. मैथ्यू लेविट, “द न्यूयॉर्क बॉम्बर वाज नॉट अ लोन वुल्फ”, द वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी, 21 सितंबर 2016
  7. एलन कोन, “एफबीआई डायरेक्टर वार्न्स ऑफ ‘टेररिस्ट डायस्पोरा’ आफ्टर इस्लामिक स्टेट क्रश्ड”, UPI.com, 27 सितंबर 2016

Translated by: Shiwanand Dwivedi (Original Article in English)
Published Date: 8th November 2016, Image Source: http://www.independent.co.uk

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